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POCSO पर दिल्ली HC का बड़ा फैसला, नाबालिग से संबंध को नहीं मिलेगी शादी की आड़
nidhi
28 Sept 2026 9:39 AM IST

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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई शादी भी 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने पर आरोपी को POCSO एक्ट के तहत कार्रवाई से सुरक्षा नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून व्यक्तिगत कानूनों से ऊपर हैं।
मामला उस समय सामने आया जब एक व्यक्ति ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आरोपी की ओर से दलील दी गई थी कि उसकी शादी मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार हुई थी और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत युवावस्था प्राप्त करने वाली लड़की विवाह कर सकती है। इसलिए शादी के बाद पति-पत्नी के बीच संबंध को अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि शादी की वैधता और नाबालिग के साथ यौन संबंध से जुड़ी आपराधिक जिम्मेदारी अलग-अलग विषय हैं। यदि लड़की की उम्र 18 साल से कम है तो POCSO एक्ट के प्रावधान लागू होंगे।
16 साल की थी लड़की, 28 वर्षीय युवक से हुई थी शादी
कोर्ट के सामने आए मामले में बताया गया कि लड़की की उम्र शादी के समय करीब 16 साल 3 महीने थी, जबकि युवक की उम्र 28 साल थी। शादी के बाद दोनों साथ रहने लगे थे। बाद में महिला के गर्भवती होने के दौरान अस्पताल में जांच के समय उसकी उम्र सामने आई, जिसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। इसके बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। आरोपी पक्ष ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर FIR रद्द करने की मांग की थी।
POCSO एक्ट में 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति बच्चा
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि POCSO एक्ट के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। ऐसे मामलों में नाबालिग की सहमति भी कानून के तहत अपराध को खत्म नहीं करती। अदालत ने कहा कि केवल शादी हो जाने से किसी व्यक्ति की उम्र नहीं बदल जाती। अगर कोई व्यक्ति शादी से पहले 16 साल का है, तो शादी के बाद भी उसकी उम्र 16 साल ही रहेगी। इसलिए नाबालिग की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून लागू रहेंगे।
व्यक्तिगत कानून और आपराधिक कानून में अंतर
कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानून किसी व्यक्ति को ऐसे आपराधिक कानूनों से छूट नहीं दे सकता, जो बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। POCSO एक्ट का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से बचाना है और इसमें उम्र का विशेष महत्व है। अदालत ने यह भी कहा कि विवाह से संबंधित धार्मिक या व्यक्तिगत कानूनों की अपनी जगह है, लेकिन जब मामला आपराधिक कानून के उल्लंघन का हो तो संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करना होगा।
पहले भी सामने आ चुके हैं अलग-अलग फैसले
इस मुद्दे पर देश की अलग-अलग अदालतों में पहले अलग-अलग विचार सामने आए हैं। कुछ पुराने मामलों में अदालतों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह और POCSO कानून के संबंध पर अलग दृष्टिकोण अपनाया था। हालांकि, हाल के फैसलों में कई अदालतों ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों को प्राथमिकता दी है।
कोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार
दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया आगे जारी रहेगी। इस फैसले के बाद नाबालिग विवाह और बच्चों के अधिकारों से जुड़े मामलों में कानूनी स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश गया है। अदालत ने साफ किया कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का पालन सभी मामलों में जरूरी है।
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