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सत्य निकेतन हादसे के बाद बड़ा फैसला, पुरानी इमारतों का होगा स्ट्रक्चरल ऑडिट

Kavita2
7 Sept 2026 5:40 PM IST
सत्य निकेतन हादसे के बाद बड़ा फैसला, पुरानी इमारतों का होगा स्ट्रक्चरल ऑडिट
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नई दिल्ली। सत्य निकेतन में बिल्डिंग ढहने की घटना के बाद दिल्ली सरकार पेइंग गेस्ट (PG) आवासों और पुरानी इमारतों की सुरक्षा को लेकर नई नीति बनाने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पुरानी इमारतों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने से पहले भवन मालिकों को स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट जमा करनी पड़ सकती है। इमारत को सुरक्षित साबित करने वाला प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही उसे पीजी, नर्सिंग होम, स्कूल या अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकेगी।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोमवार को प्रस्तावित नीति के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि सरकार ऐसी व्यवस्था तैयार कर रही है जिससे पुरानी इमारतों में संचालित होने वाले प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। सत्य निकेतन की घटना के बाद भवनों की संरचनात्मक मजबूती और उनमें बड़ी संख्या में लोगों के रहने या आने-जाने को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

सरकार का जोर ऐसे भवनों की पहचान और जांच पर रहने की संभावना है, जिनका निर्माण काफी पहले हुआ था लेकिन बाद में उनका इस्तेमाल पीजी, स्कूल, नर्सिंग होम या किसी अन्य व्यावसायिक गतिविधि के लिए किया जाने लगा।

पुरानी इमारतों के लिए स्ट्रक्चरल ऑडिट जरूरी करने की तैयारी

नई नीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्ट्रक्चरल ऑडिट होगा। इसके जरिए किसी भवन की मौजूदा स्थिति, मजबूती और सुरक्षा का तकनीकी आकलन किया जाता है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने के बाद पुराने भवनों के मालिकों को यह साबित करना पड़ सकता है कि उनकी इमारत उस गतिविधि के लिए सुरक्षित है, जिसके लिए उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।

स्ट्रक्चरल ऑडिट में भवन के कॉलम, बीम, छत, दीवारों और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों की स्थिति की जांच की जा सकती है। अगर किसी इमारत में समय के साथ बदलाव या अतिरिक्त निर्माण हुआ है तो उसकी सुरक्षा भी महत्वपूर्ण होगी।

मुख्यमंत्री के बयान से संकेत मिलता है कि केवल भवन का इस्तेमाल लंबे समय से होते रहने को सुरक्षा का आधार नहीं माना जाएगा। व्यावसायिक उपयोग के लिए तकनीकी रूप से उसकी मजबूती साबित करनी होगी।

PG के साथ स्कूल और नर्सिंग होम भी दायरे में

सरकार की प्रस्तावित नीति केवल पेइंग गेस्ट आवासों तक सीमित नहीं रहेगी। पुरानी इमारतों में संचालित नर्सिंग होम, स्कूल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी इसके दायरे में लाया जा सकता है।

इसका कारण इन स्थानों पर बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी है। पीजी में कई छात्र या नौकरीपेशा लोग एक साथ रहते हैं, जबकि स्कूलों में बच्चे और नर्सिंग होम में मरीज मौजूद रहते हैं। ऐसे में किसी भवन की संरचना कमजोर होने पर दुर्घटना के परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

सरकार चाहती है कि भवन का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू करने या जारी रखने से पहले उसकी सुरक्षा को लेकर स्पष्ट जवाबदेही तय हो।

सत्य निकेतन हादसे के बाद बढ़ी चिंता

नई नीति की तैयारी सत्य निकेतन में बिल्डिंग ढहने की घटना के बाद तेज हुई है। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास होने के कारण छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय है और यहां बड़ी संख्या में पीजी तथा किराये के आवास मौजूद हैं।

घटना के बाद प्रशासन के सामने सवाल है कि पुरानी और कमजोर इमारतों की समय रहते पहचान कैसे की जाए। साथ ही ऐसी इमारतों में क्षमता से अधिक लोगों को रखने या बिना आवश्यक सुरक्षा जांच के व्यावसायिक गतिविधियां चलाने पर किस तरह रोक लगाई जाए।

सरकार अब हादसा होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से जोखिम की पहचान करने वाली व्यवस्था तैयार करने पर विचार कर रही है।

1993 से होते रहे हैं PG को रेगुलेट करने के प्रयास

दिल्ली में पेइंग गेस्ट आवासों को व्यवस्थित और नियंत्रित करने की कोशिश नई नहीं है। राजधानी में पीजी व्यवस्था को रेगुलेट करने के प्रयास वर्ष 1993 से किए जाते रहे हैं। इसके बावजूद अलग-अलग इलाकों में पीजी के संचालन, भवन सुरक्षा, क्षमता और आवश्यक अनुमतियों से जुड़े सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास के इलाकों सहित कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में छात्र पीजी आवासों पर निर्भर हैं। इसके अलावा नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए राजधानी आने वाले युवाओं की बड़ी आबादी भी पीजी में रहती है।

ऐसे में सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि सुरक्षा नियमों को सख्त बनाने के साथ पीजी व्यवस्था को व्यावहारिक और पारदर्शी भी रखा जाए।

मालिकों की बढ़ सकती है जिम्मेदारी

प्रस्तावित नीति लागू होने पर भवन मालिकों की जिम्मेदारी बढ़ सकती है। उन्हें अपनी इमारत की संरचनात्मक स्थिति की जांच करानी होगी और संबंधित प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना पड़ सकता है।

यदि जांच में कोई इमारत असुरक्षित पाई जाती है तो उसमें आवश्यक मरम्मत या मजबूती का काम कराना पड़ सकता है। बेहद खतरनाक स्थिति में उसके व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक भी लगाई जा सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने के बजाय पहले ही खतरे को पहचानना होगा। इसके लिए सरकार को स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने वाली एजेंसियों या विशेषज्ञों के मानक भी तय करने पड़ सकते हैं।

सुरक्षा नियमों में बड़े बदलाव के संकेत

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली सरकार भवन सुरक्षा को लेकर व्यापक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के अनुसार तैयार की जा रही नीति में पुरानी इमारतों की संरचनात्मक मजबूती को उनके व्यावसायिक इस्तेमाल से जोड़ा जाएगा।

हालांकि नीति का अंतिम स्वरूप सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि कितनी पुरानी इमारतों के लिए ऑडिट अनिवार्य होगा, प्रमाण पत्र कौन जारी करेगा और नियमों का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाएंगे।

फिलहाल सरकार की तैयारी से यह साफ है कि पीजी, स्कूल, नर्सिंग होम और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान चलाने के लिए केवल जगह उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं होगा। पुरानी इमारतों को अपनी संरचनात्मक सुरक्षा भी साबित करनी पड़ सकती है।

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