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समुद्री विज्ञान में निवेश कम, एडमिरल स्वामीनाथन ने जताई चिंता

Ratna Netam
4 Nov 2026 7:39 PM IST
समुद्री विज्ञान में निवेश कम, एडमिरल स्वामीनाथन ने जताई चिंता
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नई दिल्ली। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास को लेकर भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने समुद्री विज्ञान में निवेश की कमी को लेकर चिंता जताते हुए क्षेत्रीय देशों के बीच अनुसंधान, तकनीक और सूचनाओं के आदान-प्रदान को मजबूत करने का आह्वान किया है। उनका यह संदेश ऐसे समय सामने आया है, जब समुद्री संसाधनों के संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, समुद्री व्यापार और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक क्षमताओं को बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।नई दिल्ली में 3 से 5 नवंबर तक आयोजित हो रहे इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2026 (IPRD-2026) में समुद्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग प्रमुख विषय हैं। भारतीय नौसेना और नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन में 18 देशों के विशेषज्ञों की भागीदारी निर्धारित की गई है। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिक उपलब्धियों को व्यावहारिक क्षेत्रीय सहयोग में बदलना है।
समुद्री विज्ञान में निवेश क्यों जरूरी?
समुद्र केवल व्यापार और परिवहन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं। दुनिया के विभिन्न देशों के बीच होने वाले व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों पर निर्भर है। इसके अलावा समुद्र में ऊर्जा संसाधन, खनिज संपदा, मत्स्य संसाधन और जैव विविधता के विशाल भंडार मौजूद हैं।समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त अनुसंधान और निवेश से इन संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। समुद्री तापमान, जलधाराओं, समुद्र के बढ़ते स्तर और मौसम संबंधी बदलावों का अध्ययन प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार समुद्री विज्ञान में निवेश बढ़ाने से तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका, समुद्री परिवहन और पर्यावरण संरक्षण को भी लाभ मिल सकता है।
क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का आह्वान
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कई ऐसे देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है। हालांकि, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी सुविधाओं और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता सभी देशों में समान नहीं है।ऐसे में क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से वैज्ञानिक उपकरणों, अनुसंधान सुविधाओं और विशेषज्ञता का साझा उपयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है।भारतीय नौसेना की ओर से जारी सम्मेलन संबंधी जानकारी में भी स्वीकार किया गया है कि समुद्र आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनका प्रबंधन करने के लिए सम्मेलन में इसी अंतर को कम करने के लिए संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी विकास और वैज्ञानिक आंकड़ों तक उचित पहुंच जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है।
जलवायु परिवर्तन बनी बड़ी चुनौती
समुद्री विज्ञान में निवेश का महत्व जलवायु परिवर्तन के कारण और बढ़ गया है। समुद्र के तापमान में बदलाव, समुद्र के स्तर में वृद्धि और चक्रवाती गतिविधियों जैसी चुनौतियां तटीय देशों के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।भारत समेत हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों में बड़ी आबादी समुद्र तटों के आसपास रहती है। ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का सीधा असर लोगों की सुरक्षा, आजीविका और बुनियादी ढांचे पर पड़ सकता है।समुद्री अनुसंधान के माध्यम से मौसम संबंधी घटनाओं का बेहतर पूर्वानुमान लगाने, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को समझने और आपदा प्रबंधन की क्षमताओं को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।IPRD-2026 के प्रमुख विषयों में समुद्र विज्ञान और जलवायु अनुकूलन क्षमता को भी शामिल किया गया है। सम्मेलन में इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने के उपायों पर विचार किया जा रहा है।
समुद्री सुरक्षा में आधुनिक तकनीक की बढ़ती भूमिका
आधुनिक दौर में समुद्री सुरक्षा केवल युद्धपोतों और पनडुब्बियों तक सीमित नहीं रह गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उपग्रह आधारित निगरानी, समुद्री सेंसर, ड्रोन और अन्य उभरती तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।इन तकनीकों की सहायता से समुद्री गतिविधियों की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।समुद्र के भीतर बिछी संचार केबल, ऊर्जा पाइपलाइन और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएं भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। इनकी सुरक्षा के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय समन्वय आवश्यक है।भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित सम्मेलन में समुद्री परिस्थितियों की जानकारी, महत्वपूर्ण समुद्री बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और नई तकनीकों के उपयोग को अलग-अलग चर्चा सत्रों में शामिल किया गया है।
आत्मनिर्भरता के साथ अंतरराष्ट्रीय साझेदारी जरूरी
एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने 3 नवंबर को दिल्ली डिफेंस डायलॉग में भी रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को रणनीतिक आवश्यकता बताया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को ऐसी नौसेना विकसित करनी चाहिए, जो बाहरी आपूर्ति या अन्य निर्भरताओं से प्रभावित हुए बिना अपनी परिचालन क्षमताओं को बनाए रख सके।उन्होंने अनुसंधान एवं विकास में अधिक निवेश करने और नई तकनीकों को कम समय में व्यावहारिक क्षमताओं में बदलने की आवश्यकता भी बताई थी। साथ ही स्पष्ट किया था कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दूसरे देशों से अलग-थलग होना नहीं है। मित्र देशों के साथ मजबूत स्थिति से सहयोग करना भी आवश्यक है।
वैज्ञानिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों की भूमिका अहम
समुद्री अनुसंधान को बढ़ावा देने में विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाकर समुद्री पर्यावरण, सुरक्षा और संसाधन प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं के समाधान तलाशे जा सकते हैं।IPRD-2026 के पहले दिन शैक्षणिक नेटवर्क, अनुसंधान और मानव संसाधन विकास पर विशेष चर्चा हुई। इस दौरान हिंद महासागर क्षेत्र के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और नीति निर्माण से जुड़े संगठनों के बीच सहयोग मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार किया गया।सम्मेलन में सामाजिक विज्ञान से संबंधित अनुसंधान को भी महत्व दिया गया। इसका उद्देश्य समुद्री गतिविधियों के आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक प्रभावों को बेहतर तरीके से समझना है।
भारत की समुद्री रणनीति के लिए महत्वपूर्ण पहल
भारत हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और विकास संबंधी सहयोग को अपनी विदेश तथा रक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तुत इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव भी क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।भारतीय नौसेना का यह सम्मेलन वैज्ञानिक अनुसंधान और समुद्री सुरक्षा को जोड़ने का अवसर प्रदान कर रहा है। इसमें तकनीकी साझेदारी, जलवायु संबंधी चुनौतियों और साझा समुद्री हितों पर व्यावहारिक समाधान तलाशने पर जोर है।समुद्री विज्ञान में अधिक निवेश और क्षेत्रीय सहयोग का विस्तार भारत के साथ-साथ अन्य हिंद-प्रशांत देशों के लिए भी लाभकारी हो सकता है। इससे समुद्री संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, सुरक्षित व्यापारिक मार्ग और जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने की क्षमता मजबूत होने की उम्मीद है।
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