- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- विरोध-प्रदर्शन में...

नई दिल्ली। नीट पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी करने के मामले में रुचिका सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इस कार्रवाई के बाद मामला राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन गया है। जहां एक ओर शिकायतकर्ताओं ने इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा से जुड़ा मामला बताया है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
जानकारी के अनुसार, 23 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में बड़ी संख्या में छात्र और युवा प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान रुचिका सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें उन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया। वीडियो सामने आने के बाद शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि रुचिका सिंह की कथित टिप्पणी से प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को नुकसान पहुंचा है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि इस तरह की भाषा से समाज में तनाव और वैमनस्य फैल सकता है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने शुरुआती कार्रवाई करते हुए एफआईआर दर्ज की।
मामले में 29 जुलाई को गौतमबुद्ध नगर के एक्सप्रेसवे थाने में जीरो एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया है। एफआईआर में BNS की धारा 352, 353(1) और 356(1) का उल्लेख किया गया है। चूंकि घटना दिल्ली के संसद मार्ग थाना क्षेत्र से जुड़ी बताई जा रही है, इसलिए आगे की जांच के लिए मामला दिल्ली पुलिस को ट्रांसफर कर दिया गया है।
अब दिल्ली पुलिस वायरल वीडियो, शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरे मामले की जांच कर रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वीडियो में कही गई बातों की वास्तविकता क्या है और किन परिस्थितियों में यह बयान दिया गया था।
इस बीच, वकील सौरव दास के बयान ने इस मामले को लेकर एक नई बहस खड़ी कर दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने रुचिका सिंह के खिलाफ हुई कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा की गई अभद्र भाषा अपने आप में आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई जनप्रतिनिधियों पर पहले से आपराधिक मामले दर्ज हैं और पुलिस को युवाओं के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय अन्य मामलों पर भी ध्यान देना चाहिए।
सौरव दास के बयान के बाद सोशल मीडिया पर दो पक्ष सामने आ गए हैं। एक पक्ष का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है। वहीं दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी मामले में यह देखना जरूरी होता है कि कथित बयान का स्वरूप क्या था, उसका उद्देश्य क्या था और क्या उससे किसी प्रकार की सार्वजनिक अशांति या वैमनस्य पैदा होने की संभावना थी। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि मामले में आगे किस तरह की कार्रवाई होगी।
फिलहाल रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जांच जारी है। यह मामला एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक विरोध और संवैधानिक पदों की गरिमा के बीच संतुलन को लेकर चर्चा का केंद्र बन गया है। आने वाले दिनों में पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर मामले की दिशा तय होगी।





