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New Delhi नई दिल्ली: स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है। वे विधायकों के विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर उनके असर से जुड़े मामले में दखल देना चाहते हैं। सात जजों की संविधान पीठ 6 अक्टूबर को विधायकों के विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर उनके असर से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या पर सुनवाई शुरू करेगी।
अपनी याचिका में कॉमेडियन ने कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के सामने मौजूद कानूनी सवालों से सीधे तौर पर प्रभावित हैं, क्योंकि महाराष्ट्र विधानसभा में उनके स्टैंड-अप कॉमेडी स्पेशल "नया भारत" को लेकर उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही चल रही है। कामरा ने कहा कि नागरिकों की आवाज़ को "दबाने" के लिए विधायी विशेषाधिकार का इस्तेमाल लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट करता है।
इस स्टैंड-अप कॉमेडी स्पेशल में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर किए गए मज़ाक को लेकर काफी विवाद हुआ था। बीजेपी विधायक प्रवीण दरेकर ने कामरा और शिवसेना (UBT) की प्रवक्ता सुषमा अंधारे के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया था। कामरा ने अपनी याचिका में कहा, "याचिकाकर्ता का मानना है कि उनका मामला यह दिखाता है कि विधायी विशेषाधिकारों का इस्तेमाल न केवल प्रेस के सदस्यों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रभावित करता है, बल्कि किसी भी ऐसे नागरिक की आज़ादी को भी प्रभावित करता है जो विधायिका के सदस्यों के कामों के बारे में बात करना चाहता है।"
विधायकों के विधायी विशेषाधिकारों के दायरे से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार के साथ उनके संबंध से जुड़ा मुद्दा दिसंबर 2003 में पांच जजों की पीठ को भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 8 दिसंबर, 2003 के अपने आदेश में कहा था, "यह स्पष्ट है कि इसमें अनुच्छेद 194(3), 19(1)(a), इन दोनों अनुच्छेदों के बीच संबंध, अनुच्छेद 21 और भारत के संविधान के अन्य प्रावधानों की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवाल शामिल हैं।"
दिसंबर 2004 में, जब यह मामला पांच जजों की पीठ के सामने आया, तो उन्हें इस मुद्दे पर दो अलग-अलग पीठों द्वारा व्यक्त की गई परस्पर विरोधी राय के बारे में बताया गया। इसके बाद पांच जजों की बेंच ने सुझाव दिया कि इस मामले को पक्के फ़ैसले के लिए सात जजों की बेंच के सामने रखा जाए। एक याचिका — जिसका शीर्षक 'एन रवि और अन्य बनाम स्पीकर, लेजिस्लेटिव असेंबली, तमिलनाडु' है — यह सवाल उठाती है कि क्या मौलिक अधिकार विधायी विशेषाधिकारों से ऊपर हैं।
यह मामला 2003 का है, जब पत्रकार एन रवि और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। तमिलनाडु विधानसभा के स्पीकर के. कालीमुथु ने विशेषाधिकार के कथित उल्लंघन और अवमानना के लिए उनकी गिरफ़्तारी का आदेश दिया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने छह पत्रकारों की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी और बाद में अलग-अलग फ़ैसलों को देखते हुए मामले को सात जजों की बेंच को सौंप दिया था। एक फ़ैसले में कहा गया था कि मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जबकि 1965 के फ़ैसले में कहा गया था कि मौलिक अधिकार संसदीय विशेषाधिकारों के अधीन हैं।
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