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नई दिल्ली। कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच चल रहे विवाद में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने कर्नाटक को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के आदेश का पालन जारी रखने को कहा है। साथ ही कर्नाटक को तमिलनाडु की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 24 सितंबर 2026 के मामलों की कॉज लिस्ट प्रकाशित है। कावेरी जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा है और इससे पहले भी शीर्ष अदालत कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण तथा जल प्रबंधन व्यवस्था से जुड़े मामलों पर आदेश दे चुकी है।
सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार ने राज्य में पानी की उपलब्धता को लेकर अपनी स्थिति अदालत के सामने रखी। कर्नाटक की ओर से बताया गया कि अपेक्षा के मुताबिक मानसून की बारिश नहीं होने के कारण राज्य के जलाशयों में पानी का स्तर प्रभावित हुआ है। कावेरी बेसिन में भी पानी की उपलब्धता कम बताई गई है।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान जलाशयों में करीब 81 टीएमसी पानी का भंडारण था, जबकि इस वर्ष जलाशयों में आने वाले पानी यानी इनफ्लो में कमी आई है। कर्नाटक ने अदालत के सामने भविष्य में पेयजल की जरूरत का मुद्दा भी उठाया।
कर्नाटक का कहना है कि मानसून से अपेक्षित बारिश नहीं मिलने के कारण राज्य में सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो रही हैं। ऐसे में CWMA के निर्देश के मुताबिक तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। राज्य ने गर्मियों के दौरान पेयजल की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका भी जताई है।
दूसरी ओर तमिलनाडु लगातार अपने हिस्से का कावेरी जल उपलब्ध कराने की मांग करता रहा है। अगस्त 2026 में भी तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए कर्नाटक से पानी जारी कराने की मांग की थी। उस समय तमिलनाडु ने दावा किया था कि उसे निर्धारित मात्रा में पानी नहीं मिल रहा है।
तमिलनाडु की ओर से कृषि जरूरतों को भी इस विवाद का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। कावेरी डेल्टा क्षेत्र में खेती काफी हद तक नदी के पानी पर निर्भर है। पानी की उपलब्धता में कमी का सीधा असर धान और दूसरी फसलों की सिंचाई पर पड़ने की बात राज्य की ओर से उठाई जाती रही है।
कावेरी नदी का जल बंटवारा दशकों से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच संवेदनशील विषय रहा है। कर्नाटक में नदी और उससे जुड़े जलाशयों का पानी सिंचाई के साथ बेंगलुरु सहित विभिन्न क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा की कृषि के लिए नदी के पानी की बड़ी भूमिका है। यही कारण है कि कम बारिश वाले वर्षों में दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर विवाद अधिक बढ़ जाता है।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण का गठन सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद बनी व्यवस्था के तहत किया गया था। प्राधिकरण का काम उपलब्ध पानी और निर्धारित जल बंटवारे के अनुसार संबंधित राज्यों के बीच पानी छोड़ने की व्यवस्था की निगरानी करना है। कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी कावेरी बेसिन से जुड़े पक्ष हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 के एक फैसले में भी कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अवॉर्ड और 2018 के शीर्ष अदालत के फैसले के अनुपालन से जुड़े तमिलनाडु के दावों पर विचार किया था। इससे स्पष्ट है कि नदी के पानी के इस्तेमाल और बंटवारे से जुड़े मुद्दे लगातार न्यायिक समीक्षा का विषय बने हुए हैं।
मौजूदा विवाद में मुख्य सवाल उपलब्ध पानी और दोनों राज्यों की जरूरतों के बीच संतुलन का है। कर्नाटक अपनी ओर से कम बारिश, जलाशयों में कम आवक और भविष्य की पेयजल जरूरतों का हवाला दे रहा है। दूसरी ओर तमिलनाडु अपनी निर्धारित हिस्सेदारी और कृषि आवश्यकताओं को लेकर पानी जारी करने की मांग कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कर्नाटक को CWMA के आदेश का पालन जारी रखने को कहा है। इसके साथ ही राज्य सरकार को अपनी स्थिति विस्तार से स्पष्ट करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है। कर्नाटक द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामे में जलाशयों के मौजूदा स्तर, पानी की आवक, बारिश की स्थिति और राज्य की आवश्यकताओं से जुड़े आंकड़े महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। तब अदालत के सामने कर्नाटक का हलफनामा और तमिलनाडु की ओर से रखे गए तर्क मौजूद होंगे। इसके आधार पर आगे की सुनवाई होगी।
कावेरी विवाद का प्रभाव केवल दोनों राज्य सरकारों तक सीमित नहीं है। कर्नाटक में पेयजल और सिंचाई से जुड़े लोगों के साथ तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र के किसानों की नजर भी इस मामले पर बनी हुई है। पानी की उपलब्धता कम होने पर दोनों राज्यों में किसानों और आम नागरिकों की चिंताएं बढ़ती हैं।
तमिलनाडु में किसान संगठनों ने हाल के दिनों में कावेरी का पानी तत्काल उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई है। किसान संगठनों का कहना है कि पानी की कमी से कृषि गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
अब कर्नाटक को एक सप्ताह के भीतर अपना हलफनामा दाखिल कर अदालत को पानी की उपलब्धता और अपनी कठिनाइयों की विस्तृत जानकारी देनी होगी। तब तक सुप्रीम कोर्ट ने CWMA के आदेश का पालन जारी रखने का निर्देश दिया है। 12 अक्टूबर की अगली सुनवाई में कावेरी जल बंटवारे के इस विवाद में आगे की कानूनी स्थिति और स्पष्ट होने की संभावना है।





