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कपिल सिब्बल का बड़ा प्रस्ताव दल बदलने पर लगे लंबा बैन
Ratna Netam
14 Sept 2026 6:26 PM IST

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नई दिल्ली : देश की राजनीति में दल-बदल और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के पाला बदलने को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस शुरू हो गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सुझाव दिया है कि कार्यकाल के बीच पार्टी बदलने वाले सांसदों और विधायकों को अगले 10 साल तक सार्वजनिक पद या संवैधानिक पद संभालने से रोका जाना चाहिए। उनके इस प्रस्ताव को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने समर्थन दिया है। हालांकि CJP इस मामले में सिब्बल से भी सख्त रुख अपनाते हुए पहले से 20 साल की रोक की मांग करती रही है।
कपिल सिब्बल ने केरल के कोच्चि में 'Horse-Trade and Democracy' विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान देश के मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि संविधान की दसवीं अनुसूची की वर्तमान व्यवस्था राजनीतिक दल-बदल की समस्या को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत बताते हुए एक सरल और ज्यादा कठोर प्रावधान की वकालत की।
सिब्बल के प्रस्ताव के मुताबिक यदि कोई सांसद या विधायक जिस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर आया है, अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले उस पार्टी को छोड़ता है तो उसे 10 साल तक सार्वजनिक पद या संवैधानिक जिम्मेदारी संभालने से अयोग्य किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर दल बदलने की राजनीतिक कीमत इतनी ज्यादा होगी तो निर्वाचित प्रतिनिधि ऐसा करने से पहले कई बार सोचेंगे।
सिब्बल ने दसवीं अनुसूची में मौजूद 'मर्जर' यानी विलय से जुड़े प्रावधानों को लेकर भी सवाल उठाए। मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून में कुछ परिस्थितियों में पार्टी के विलय को लेकर अपवाद मौजूद हैं। सिब्बल का कहना है कि इसी तरह के प्रावधानों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर विधायकों या सांसदों के एक साथ पाला बदलने के लिए किया जा सकता है।
उनका सुझाव है कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें इस्तीफा देकर या विलय का रास्ता अपनाकर दल-बदल विरोधी कानून के उद्देश्य से बचना आसान न हो। सिब्बल का तर्क लोकतंत्र में मतदाता के जनादेश की सुरक्षा से जुड़ा है। जब मतदाता किसी उम्मीदवार को एक विशेष राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न और नीतियों के आधार पर चुनते हैं और वही जनप्रतिनिधि बाद में दूसरी पार्टी में चला जाता है तो जनादेश को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
इसी प्रस्ताव पर CJP ने समर्थन जताया है। CJP के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दिपके ने सिब्बल के सुझाव को मौजूदा समय की जरूरत बताया। पार्टी का कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के दल बदलने को रोकने के लिए ज्यादा सख्त नियमों की जरूरत है।
दिलचस्प बात यह है कि CJP की अपनी मांग कपिल सिब्बल के प्रस्ताव से भी ज्यादा कठोर है। CJP के मांग-पत्र में पार्टी बदलने वाले सांसद या विधायक को चुनाव लड़ने और सार्वजनिक पद संभालने से **20 साल तक प्रतिबंधित** करने की मांग शामिल है। यानी सिब्बल जहां 10 साल की रोक की बात कर रहे हैं, वहीं CJP इस अवधि को दोगुना रखने के पक्ष में है।
इस बहस के केंद्र में संविधान की दसवीं अनुसूची है। इसे आम तौर पर दल-बदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है। इसका उद्देश्य निर्वाचित सांसदों और विधायकों द्वारा राजनीतिक दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है। हालांकि वर्षों से इसके विभिन्न प्रावधानों और उनके इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी विवाद होते रहे हैं।
विशेष रूप से पार्टी के विलय और विधायक दल तथा मूल राजनीतिक दल के बीच संबंधों की व्याख्या कई मामलों में अदालतों तक पहुंची है। कपिल सिब्बल खुद भी इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में उठा चुके हैं। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। इस याचिका में दसवीं अनुसूची के तहत विलय संबंधी प्रावधान की व्याख्या को चुनौती दी गई है।
सिब्बल का तर्क है कि दल-बदल केवल किसी एक विधायक या सांसद के पार्टी छोड़ने तक सीमित मुद्दा नहीं है। बड़े पैमाने पर जनप्रतिनिधियों के पाला बदलने से सरकारों और सदन के राजनीतिक समीकरण तक बदल सकते हैं। इसलिए सवाल सीधे मतदाताओं के फैसले और लोकतांत्रिक जनादेश से जुड़ जाता है।
इस मुद्दे का दूसरा पहलू निर्वाचित प्रतिनिधि की स्वतंत्रता से भी जुड़ा है। किसी राजनीतिक दल के अंदर विचारों को लेकर मतभेद होना लोकतंत्र का हिस्सा है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि किसी सांसद या विधायक का अपनी पार्टी से गंभीर वैचारिक मतभेद हो जाए तो उसके सामने क्या विकल्प होना चाहिए। सिब्बल का प्रस्ताव इसी जगह पर स्पष्ट सीमा खींचने की कोशिश करता है—यदि कोई व्यक्ति एक पार्टी के चुनाव चिह्न पर जनता से जनादेश लेकर सदन में पहुंचा है और कार्यकाल के बीच पार्टी बदलता है तो उसे उसके राजनीतिक परिणाम भी भुगतने चाहिए।
दल-बदल विरोधी कानून को लेकर एक और बड़ा विवाद फैसला लेने की प्रक्रिया से जुड़ा रहा है। सांसद या विधायक की अयोग्यता से जुड़े मामलों में स्पीकर की भूमिका कई बार राजनीतिक विवाद का विषय बनती रही है। ऐसे मामलों में फैसले में देरी को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
सिब्बल का सुझाव मौजूदा जटिल व्यवस्था के बजाय एक स्पष्ट नियम बनाने की तरफ इशारा करता है। उनके अनुसार पार्टी बदलने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि को लंबी अवधि के लिए सार्वजनिक पद से बाहर रखने का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान दल-बदल को हतोत्साहित कर सकता है।
हालांकि इस तरह का प्रस्ताव लागू करने के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया की जरूरत होगी। अभी यह कोई लागू कानून नहीं है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि पार्टी बदलने वाले सांसदों या विधायकों पर 10 साल का प्रतिबंध लग चुका है। फिलहाल यह कपिल सिब्बल की ओर से रखा गया **सुधार का प्रस्ताव** है, जिसे CJP ने समर्थन दिया है।
CJP का कहना है कि उसकी तरफ से इससे पहले ही 20 साल की रोक की मांग रखी जा चुकी है। पार्टी के मुताबिक निर्वाचित प्रतिनिधि यदि दल बदलता है तो उसे लंबे समय तक चुनाव लड़ने और सार्वजनिक पद संभालने से दूर रखना चाहिए। इस सख्त प्रस्ताव के पीछे तर्क यह है कि इससे चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक खरीद-फरोख्त और अवसरवादी दल-बदल पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
यह बहस भारतीय राजनीति के पुराने सवाल को फिर सामने लाती है—एक निर्वाचित सांसद या विधायक का जनादेश व्यक्तिगत होता है या उस राजनीतिक दल से भी जुड़ा होता है जिसके टिकट और चुनाव चिह्न पर वह जीतकर आया है? यदि जनादेश में पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है तो कार्यकाल के बीच पार्टी बदलने पर मतदाता की राय दोबारा लेना कितना जरूरी होना चाहिए?
सिब्बल का प्रस्ताव इसी सवाल का कठोर जवाब देता दिखाई देता है। उनका मानना है कि दसवीं अनुसूची में व्यापक बदलाव कर ऐसा प्रावधान बनाया जाए जिससे इस्तीफा, विलय या पार्टी बदलने के दूसरे रास्तों के जरिए जनादेश बदलने की गुंजाइश कम हो।
अब इस प्रस्ताव पर राजनीतिक दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। यदि दल-बदल कानून में इस स्तर का बदलाव करना है तो इसके कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा जरूरी होगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि दल-बदल का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में लौट आया है। कपिल सिब्बल ने पार्टी बदलने वाले सांसदों और विधायकों के खिलाफ 10 साल तक सार्वजनिक पद से दूर रखने जैसा कठोर प्रस्ताव सामने रखा है और CJP ने इसका समर्थन करते हुए अपनी पुरानी 20 साल की मांग दोहराई है। अब सवाल यह है कि क्या इस बहस से दल-बदल विरोधी कानून में वास्तव में कोई बड़ा बदलाव निकलेगा या यह प्रस्ताव राजनीतिक चर्चा तक ही सीमित रह जाएगा।
सिब्बल ने कोच्चि के कार्यक्रम में दसवीं अनुसूची को पूरी तरह बदलने और मध्यावधि में पार्टी बदलने वाले जनप्रतिनिधि के लिए 10 साल की अयोग्यता का प्रस्ताव रखा था। वहीं CJP के घोषित एजेंडे में 20 साल की रोक है।
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