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क्रिमिनल केस में व्यक्तिगत विचार न थोपें जज, सुप्रीम कोर्ट का संदेश
nidhi
1 Oct 2026 7:33 AM IST

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न्यायिक आदेशों में निजी सोच से बचने की जरूरत
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों को कानून और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर फैसला देने की अहमियत पर जोर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेशों में व्यक्तिगत धारणाओं या निजी विचारों को हावी नहीं होने देना चाहिए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में फैसला संबंधित कानून, साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। न्यायालय को ऐसी टिप्पणियों से बचना चाहिए जिनका मामले के कानूनी सवालों से सीधा संबंध नहीं हो।
शीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक विवेक का इस्तेमाल तय कानूनी सिद्धांतों के दायरे में किया जाना चाहिए। किसी आरोपी के अधिकारों और आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े मामलों में अदालतों की भूमिका निष्पक्ष और कानूनसम्मत होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पहले भी अलग-अलग मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि न्यायिक समीक्षा करते समय अदालतों को अपने विचार संबंधित प्राधिकरण या कानूनी व्यवस्था के स्थान पर नहीं रखने चाहिए, जब तक फैसला मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के खिलाफ न हो।
मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को निचली अदालतों और हाई कोर्ट के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि आपराधिक मामलों में आदेश देते समय व्यक्तिगत दृष्टिकोण की बजाय कानूनी आधार सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।
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