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राम जन्मभूमि ट्रस्ट को RTI दायरे से बाहर रखने पर जॉन ब्रिटास ने केंद्र से पुनर्विचार की मांग की

Delhi दिल्ली: सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वह अपने उस रुख पर पुनर्विचार करे, जिसके तहत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत “पब्लिक अधिकारी” नहीं माना गया है। ब्रिटास ने कहा कि शरणार्थियों और पब्लिक जवाबदेही के हित में यह फैसला दोबारा देखा जाना चाहिए।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के सांसद जॉन ब्रिटास ने 4 जुलाई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखकर यह मुद्दा उठाया। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि ट्रस्ट की स्थापना की प्रक्रिया असामान्य रही है और इसके गठन में सरकारी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
अमित शाह को भेजे गए पत्र में ब्रिटास ने कहा कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना के माध्यम से ट्रस्ट के संचालन की योजना तैयार की थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस ट्रस्ट में शामिल भूमि भी सरकारी प्रक्रिया के तहत अधिग्रहण की गई थी।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को लेकर ब्रितास ने तर्क दिया कि इसके 15 सदस्यों में से शुरुआती चरण में 12 सदस्यों को सरकार द्वारा नामित किया गया था, जिससे इसके सार्वजनिक स्वरूप पर सवाल उठते हैं।
उन्होंने अपने पत्र में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 6 जून 2025 के आदेश का भी हल दिया, जिसमें कहा गया था कि ट्रस्ट RTI अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं आता है। ब्रितास ने कहा कि यह फैसला गृह मंत्रालय के पहले के रुख पर काफी हद तक आधारित था।
उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय से आग्रह किया कि वह इस पूरे मामले पर फिर से विचार करे और ट्रस्ट को RTI के दायरे में लाने की संभावना पर पुनर्मूल्यांकन करे। उनका कहना है कि इससे ट्रस्ट से जुड़ी गतिविधियों में विस्थापन
ब्रितास ने अपने पत्र में यह भी कहा कि जब किसी संस्था के निर्माण, संचालन और संरचना में सरकारी भागीदारी महत्वपूर्ण हो, तो उसे पूरी तरह से आरटीआई से बाहर रखना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि सार्वजनिक हित और विस्थापन से भी जुड़ा है। इसलिए सरकार को अपने वर्तमान रुख पर संशोधन करना चाहिए।
केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि किन विद्वानों को आरटीआई के दायरे में रखा जाना चाहिए और किन्हें नहीं।
केंद्र सरकार की ओर से इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।





