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उन्नाव केस में जयदीप सेंगर ने मांगी राहत, हाईकोर्ट ने CBI को भेजा नोटिस

Ratna Netam
3 Nov 2026 2:57 PM IST
उन्नाव केस में जयदीप सेंगर ने मांगी राहत, हाईकोर्ट ने CBI को भेजा नोटिस
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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित उन्नाव कस्टोडियल डेथ मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही एक बार फिर चर्चा में है। भाजपा से निष्कासित पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के भाई जयदीप सिंह सेंगर ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देते हुए अपनी जेल की सजा अस्थायी रूप से निलंबित करने की मांग की थी। इस याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जवाब मांगा था। यह आदेश 9 फरवरी 2026 को दिया गया था। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी के लिए निर्धारित की थी। जयदीप सेंगर को उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई है।उन्नाव का यह मामला वर्ष 2017 के बहुचर्चित दुष्कर्म प्रकरण से जुड़ा हुआ है। इस मामले ने देशभर में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक चर्चा पैदा की थी। दुष्कर्म पीड़िता के पिता की अप्रैल 2018 में पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। जांच एजेंसी ने अपनी पड़ताल में कई लोगों की भूमिका सामने आने का दावा किया था।मार्च 2020 में दिल्ली की विशेष अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर, उनके भाई जयदीप सिंह सेंगर और अन्य दोषियों को पीड़िता के पिता की मौत से जुड़े मामले में सजा सुनाई थी। जयदीप सेंगर को 10 साल के कठोर कारावास की सजा मिली थी। इसके बाद उन्होंने अपनी दोषसिद्धि और सजा को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
स्वास्थ्य संबंधी कारणों का दिया हवाला
जयदीप सिंह सेंगर ने अपनी याचिका में गंभीर बीमारी का हवाला देते हुए सजा को तीन महीने के लिए निलंबित करने की मांग की थी।उनकी ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया था कि वह मुंह के कैंसर से पीड़ित हैं और बीमारी दोबारा उभरने के संकेत मिले हैं। बचाव पक्ष का तर्क था कि जयदीप को विशेष चिकित्सा देखभाल और नियमित उपचार की आवश्यकता है।वकीलों ने अदालत से अनुरोध किया कि स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें अस्थायी राहत प्रदान की जाए।याचिका में यह भी बताया गया था कि जयदीप सेंगर को पहले चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत दी गई थी, जिसकी अवधि समय-समय पर बढ़ाई गई।
जुलाई 2024 में मिली थी अंतरिम जमानत
दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई 2024 में जयदीप सेंगर को चिकित्सा कारणों से अंतरिम जमानत प्रदान की थी। शुरुआत में यह राहत सीमित अवधि के लिए दी गई थी।बाद में उनकी ओर से उपचार की आवश्यकता बताते हुए अंतरिम जमानत बढ़ाने का अनुरोध किया गया।फरवरी 2026 में अदालत के सामने फिर से उनकी स्वास्थ्य स्थिति और सजा निलंबन का मुद्दा आया। जयदीप के वकीलों ने कहा कि बीमारी के उपचार के लिए उन्हें अतिरिक्त समय और विशेष चिकित्सा सुविधाओं की जरूरत है।हालांकि, किसी दोषी को चिकित्सा आधार पर राहत देने से पहले अदालत को उसकी स्वास्थ्य स्थिति, उपलब्ध उपचार सुविधाओं और अन्य कानूनी परिस्थितियों पर विचार करना होता है।
CBI ने चिकित्सा दस्तावेजों पर उठाए सवाल
इस मामले में सीबीआई ने जयदीप सेंगर को दी जाने वाली अतिरिक्त राहत का विरोध किया था।जांच एजेंसी की ओर से प्रस्तुत दलीलों में कुछ चिकित्सा दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए गए। सीबीआई का कहना था कि प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच जरूरी है।बचाव पक्ष ने बीमारी की गंभीरता का हवाला देते हुए विशेष उपचार की आवश्यकता दोहराई।दोनों पक्षों की दलीलों के बीच अदालत ने स्वतंत्र चिकित्सकीय मूल्यांकन को आवश्यक माना।24 फरवरी 2026 के आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि चिकित्सा आधार पर सजा निलंबन का निर्णय विश्वसनीय और निष्पक्ष चिकित्सकीय जानकारी के आधार पर लिया जाना चाहिए।
AIIMS को मेडिकल बोर्ड बनाने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने जयदीप सिंह सेंगर की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति का पता लगाने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली को मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया।अदालत ने मेडिकल बोर्ड से यह जांच करने को कहा कि जयदीप वास्तव में कैंसर या किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं या नहीं।इसके अतिरिक्त यह भी पता लगाने को कहा गया कि उनका उपचार जेल अस्पताल में संभव है अथवा सरकारी अस्पताल में सुरक्षा के साथ ले जाकर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।अदालत ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि जयदीप को मेडिकल बोर्ड के सामने प्रस्तुत किया जाए और उनके उपचार से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज चिकित्सकों को दिए जाएं।इस आदेश का उद्देश्य जयदीप की स्वास्थ्य स्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन कराना था, ताकि सजा निलंबन की मांग पर उचित निर्णय लिया जा सके।
अदालत ने आत्मसमर्पण करने को भी कहा था
इससे पहले 20 फरवरी 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने जयदीप सेंगर को जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था।अदालत ने पाया था कि उनकी अंतरिम राहत की अवधि बढ़ाने के संबंध में आवश्यक न्यायिक आदेश की स्थिति स्पष्ट नहीं थी।हाईकोर्ट ने कहा था कि विधिवत राहत प्राप्त किए बिना किसी दोषी का जेल से बाहर रहना उचित नहीं है।अदालत ने सजा निलंबन की याचिका पर विचार करने से पहले संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया था।
क्या है उन्नाव कस्टोडियल डेथ मामला?
उन्नाव दुष्कर्म प्रकरण की पीड़िता के पिता की 9 अप्रैल 2018 को पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी।इससे पहले उनके साथ मारपीट की घटना हुई थी। बाद में उन्हें अवैध हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।हिरासत के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने और मौत होने के बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया।सीबीआई जांच के आधार पर अदालत ने विभिन्न आरोपियों के खिलाफ कानूनी मार्च 2020 में विशेष अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर, जयदीप सेंगर और अन्य दोषियों को गैरइरादतन हत्या सहित संबंधित अपराधों में सजा सुनाई थी।कुलदीप सिंह सेंगर को वर्ष 2017 के दुष्कर्म मामले में अलग से उम्रकैद की सजा भी सुनाई गई थी। दोनों मामले अलग-अलग न्यायिक कार्यवाहियों से संबंधित हैं।
सजा निलंबन और दोषसिद्धि में क्या अंतर है?
कानूनी दृष्टि से सजा निलंबित करने का अर्थ किसी दोषी व्यक्ति को आरोपों से मुक्त करना नहीं होता।जब कोई दोषी निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करता है, तो कुछ परिस्थितियों में अपील लंबित रहने के दौरान उसकी सजा अस्थायी रूप से निलंबित की जा सकती है।हालांकि, ऐसी राहत अदालत के विवेक और मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।जयदीप सेंगर के मामले में भी उनकी स्वास्थ्य स्थिति और अन्य कानूनी पहलुओं के आधार पर राहत देने या नहीं देने का प्रश्न अदालत के सामने था।
आगे की सुनवाई पर बनी नजर
उन्नाव कस्टोडियल डेथ मामला लंबे समय से न्यायिक और सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ है।जयदीप सेंगर की ओर से चिकित्सा आधार पर राहत मांगे जाने और सीबीआई द्वारा दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए जाने के बाद अदालत ने स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच का रास्ता अपनाया।जुलाई 2026 में इस मामले से संबंधित अपीलों को दिल्ली हाईकोर्ट की दूसरी पीठ के समक्ष स्थानांतरित किए जाने की भी जानकारी सामने आई थी।फिलहाल इस मामले में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील और सजा से संबंधित न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण बनी हुई है। अंतिम निर्णय अदालत के सामने प्रस्तुत साक्ष्यों, चिकित्सकीय रिपोर्ट और संबंधित कानूनों के आधार पर ही होगा।
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