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रॉकेट लॉन्च लागत विवाद पर इसरो ने दी सफाई

nidhi
23 Aug 2026 11:39 AM IST
रॉकेट लॉन्च लागत विवाद पर इसरो ने दी सफाई
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महंगे लॉन्च के दावे पर इसरो ने उठाए सवाल

नई दिल्ली : भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर एक नई रिपोर्ट ने चर्चा छेड़ दी है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं की एक स्टडी में दावा किया गया है कि भारत से रॉकेट लॉन्च की लागत दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों की तुलना में अधिक है। हालांकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने इस अध्ययन के निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहा है कि इसमें इस्तेमाल किए गए आंकड़े सही नहीं हैं।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि साल 2025 के आंकड़ों के आधार पर भारत से उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में भेजने की लागत करीब 13,302 डॉलर प्रति किलोग्राम रही, जो अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप की तुलना में अधिक बताई गई है।
रिपोर्ट में क्या कहा गया?
कैम्ब्रिज और इटली के पॉलिटेक्निक संस्थान के शोधकर्ताओं की स्टडी में 1960 से 2025 तक हजारों रॉकेट लॉन्च के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका में प्रति किलोग्राम लॉन्च लागत करीब 3,225 डॉलर, जापान में 5,287 डॉलर और चीन में 5,809 डॉलर के आसपास रही। वहीं भारत की लागत इससे ज्यादा बताई गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत के लॉन्च कॉस्ट ज्यादा दिखने की एक वजह यह है कि यहां रॉकेट का आकार और पेलोड क्षमता कई बड़े अंतरराष्ट्रीय लॉन्च सिस्टम की तुलना में कम है। कम वजन के पेलोड पर स्थायी खर्च बांटने से प्रति किलोग्राम लागत बढ़ जाती है।
ISRO ने रिपोर्ट पर उठाए सवाल
ISRO ने इस अध्ययन के निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया है। संगठन का कहना है कि रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए डेटा और तुलना के तरीके पर सवाल हैं। ISRO प्रमुख वी नारायणन ने कथित तौर पर कहा कि अध्ययन में गलत आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए हैं। ISRO का तर्क है कि भारत के अंतरिक्ष मिशनों की पहचान कम लागत, बेहतर तकनीकी क्षमता और सीमित संसाधनों के प्रभावी इस्तेमाल के लिए रही है।
भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियां
भारत ने कम बजट में कई बड़े अंतरिक्ष मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग और आदित्य-L1 जैसे मिशन भारत की तकनीकी क्षमता का उदाहरण माने जाते हैं। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने लंबे समय तक सरकारी संसाधनों के साथ काम करते हुए विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है।
अमेरिका से तुलना पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि रॉकेट लॉन्च की लागत की तुलना करते समय कई पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अमेरिका की कंपनियां जैसे स्पेसएक्स बड़े पैमाने पर लॉन्च, भारी पेलोड और पुन: उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल करती हैं, जिससे लागत कम होती है। वहीं भारत के लॉन्च सिस्टम का बड़ा हिस्सा अभी सरकारी मिशनों और सीमित व्यावसायिक लॉन्च पर आधारित रहा है।
निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए चुनौती
भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में लॉन्च लागत कम करना भारतीय स्पेस इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ज्यादा लॉन्च संख्या, बड़े रॉकेट सिस्टम और पुन: उपयोग योग्य तकनीक के विकास से भविष्य में लागत घटाई जा सकती है।
अंतरिक्ष क्षेत्र में आगे की राह
कैम्ब्रिज रिपोर्ट ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की लागत को लेकर बहस जरूर शुरू कर दी है, लेकिन ISRO का कहना है कि केवल प्रति किलोग्राम लागत के आधार पर पूरे अंतरिक्ष कार्यक्रम का मूल्यांकन करना सही तरीका नहीं है। भारत अब गगनयान, निजी रॉकेट कंपनियों और नए लॉन्च सिस्टम के जरिए अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। आने वाले वर्षों में लागत और प्रतिस्पर्धा दोनों ही भारत के लिए अहम मुद्दे रहने वाले हैं।

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