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दिल्ली-एनसीआर
जंतर-मंतर विवाद में सौरव दास और आशुतोष रांका से पूछताछ, जांच तेज
Ratna Netam
5 Nov 2026 6:27 PM IST

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नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के सामने पेश हुए। दोनों कार्यकर्ता राजौरी गार्डन स्थित क्राइम ब्रांच कार्यालय पहुंचे, जहां उनसे जंतर-मंतर पर कथित रूप से प्रतिबंधों का उल्लंघन कर प्रवेश करने और प्रदर्शन आयोजित करने से जुड़े मामले में पूछताछ की गई। पूछताछ के बाद दोनों कार्यकर्ता कार्यालय से बाहर निकले। हालांकि, पूछताछ के दौरान किन सवालों पर चर्चा हुई और दोनों ने क्या जवाब दिए, इसका विस्तृत आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।यह मामला 13 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से संबंधित है। पुलिस के अनुसार, उस दिन CJP के कुछ कार्यकर्ता सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद जंतर-मंतर के उस हिस्से में दाखिल हुए थे, जिसे विरोध प्रदर्शन के लिए अधिसूचित स्थल की सूची से हटा दिया गया था। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा अवरोधकों को पार किया, नारेबाजी की और राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसी घटनाक्रम को लेकर दिल्ली पुलिस ने अलग-अलग थानों में मामले दर्ज किए थे।पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ दर्ज दो प्राथमिकियों की जांच अब क्राइम ब्रांच कर रही है। ये एफआईआर कनॉट प्लेस और संसद मार्ग थानों में दर्ज की गई थीं। बाद में जांच को अपराध शाखा के हवाले कर दिया गया, ताकि घटनाक्रम और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं की विस्तृत पड़ताल की जा सके। दोनों कार्यकर्ताओं को पहले भी जांच में शामिल होने के लिए समन जारी किए गए थे।
गुरुवार को दोनों नेता सुबह करीब 11 बजे राजौरी गार्डन स्थित क्राइम ब्रांच कार्यालय पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया था। माना जा रहा है कि जांच का मुख्य विषय 13 अक्टूबर की घटना, प्रदर्शन के आयोजन और उस समय लागू प्रतिबंधों के कथित उल्लंघन से जुड़ा है। हालांकि, पुलिस ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस दौर की पूछताछ में कौन-कौन से दस्तावेज या अन्य साक्ष्य सामने रखे गए।इससे पहले भी दोनों कार्यकर्ताओं को पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। जंतर-मंतर की घटना के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया। कुछ दिन बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष निर्धारित शर्तों और लिखित आश्वासन के आधार पर उनकी रिहाई हुई थी। दोनों ने कानून के दायरे में रहकर गतिविधियां संचालित करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का आश्वासन दिया था।रिहाई के बाद भी मामले की आपराधिक जांच जारी रही। पुलिस ने 22 अक्टूबर को दोनों को पूछताछ के लिए बुलाया था, लेकिन उस समय उन्होंने अतिरिक्त समय मांगा था। इसके बाद नए समन जारी किए गए और गुरुवार को दोनों क्राइम ब्रांच के सामने उपस्थित हुए। जांच एजेंसी के लिए यह पेशी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे पहले दोनों कार्यकर्ता निर्धारित तारीख पर पूछताछ में शामिल नहीं हुए थे।
जंतर-मंतर का मामला केवल सुरक्षा संबंधी नियमों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने राजनीतिक अभिव्यक्ति और विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर भी बहस छेड़ दी है। CJP से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना रहा है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठाना चाहते थे। दूसरी ओर, पुलिस का पक्ष है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन के दौरान लागू नियमों और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन आवश्यक है।दरअसल, 13 अक्टूबर के प्रदर्शन का संबंध चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर उठाए जा रहे सवालों से था। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी। उस समय जंतर-मंतर पर प्रदर्शन संबंधी प्रतिबंध लागू होने के कारण पुलिस ने वहां प्रवेश रोकने के लिए बैरिकेडिंग की थी। आरोप है कि कुछ कार्यकर्ताओं ने इसी व्यवस्था का उल्लंघन किया।पुलिस द्वारा दर्ज मामलों में अनधिकृत प्रवेश और लागू प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोपों की जांच की जा रही है। इनमें से एक मामला जनता दल यूनाइटेड के कार्यालय से संबंधित शिकायत के आधार पर दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई है। जंतर-मंतर के पास स्थित इस कार्यालय के संदर्भ में शिकायत दर्ज कराई गई थी। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों के बीच संतुलन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाए। देश की राजधानी में जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक संगठनों के प्रदर्शन का प्रमुख स्थान रहा है। ऐसे में वहां विरोध प्रदर्शन पर लागू प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर उठने वाले सवालों का व्यापक महत्व है।कानूनी दृष्टि से भी यह मामला चर्चा में है। किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए बुलाए जाने या उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि उस पर लगे आरोप सिद्ध हो गए हैं। जांच एजेंसी को आरोपों के समर्थन में तथ्यों और साक्ष्यों की पड़ताल करनी होती है। वहीं, संबंधित व्यक्तियों को अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिलता है।गुरुवार को क्राइम ब्रांच कार्यालय में पेशी के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका के बाहर निकलने से पूछताछ का यह चरण पूरा हुआ। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस उन्हें आगे फिर बुलाएगी या मामले में कोई अतिरिक्त कार्रवाई करेगी। जांच की अगली दिशा के संबंध में आधिकारिक जानकारी का इंतजार है।फिलहाल, जंतर-मंतर प्रदर्शन मामला दिल्ली की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में क्राइम ब्रांच की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि 13 अक्टूबर की घटना को लेकर दर्ज दोनों एफआईआर में पुलिस किस निष्कर्ष तक पहुंचती है और आगे क्या कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है।
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