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नई दिल्ली। भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘ईओएस-05’ (EOS-05) को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट की दिशा में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के मुताबिक प्रक्षेपण के महज 18 मिनट बाद रॉकेट ने उपग्रह को सफलतापूर्वक ‘सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट’ में स्थापित कर दिया। इस उपलब्धि को भारत की अंतरिक्ष निगरानी क्षमता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उपग्रह को जिस कक्षा में स्थापित किया गया है, वह लगभग 36 हजार किलोमीटर की जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से करीब पांच हजार किलोमीटर नीचे है। यहां से EOS-05 अपने ऑनबोर्ड प्रणोदन तंत्र की मदद से निर्धारित अंतिम कक्षा की ओर आगे बढ़ेगा। मिशन की सफलता ने अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को एक बार फिर प्रदर्शित किया है।
प्रक्षेपण के 18 मिनट बाद मिली बड़ी कामयाबी
इसरो के अनुसार मिशन का महत्वपूर्ण चरण लॉन्च के करीब 18 मिनट बाद पूरा हुआ। रॉकेट ने निर्धारित उड़ान क्रम को पूरा करते हुए EOS-05 को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया।
किसी उपग्रह को उसकी निर्धारित कक्षा की दिशा में सटीक तरीके से स्थापित करना मिशन का बेहद अहम हिस्सा होता है। रॉकेट से अलग होने के बाद अब उपग्रह अपने प्रणोदन तंत्र का इस्तेमाल करते हुए अंतिम निर्धारित कक्षा की तरफ बढ़ेगा।
यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी होगी। उपग्रह की कक्षा को धीरे-धीरे बदला जाएगा और अंततः उसे उस स्थान तक पहुंचाया जाएगा जहां से वह अपने निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार काम कर सकेगा।
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से करीब 5000 किलोमीटर नीचे
EOS-05 को फिलहाल जिस कक्षा में पहुंचाया गया है, वह जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से लगभग पांच हजार किलोमीटर नीचे बताई गई है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट पृथ्वी से करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर होती है।
इस ऊंचाई तक भारी और अत्याधुनिक उपग्रहों को पहुंचाने के लिए शक्तिशाली प्रक्षेपण यान के साथ अत्यधिक सटीक नेविगेशन और नियंत्रण तकनीक की आवश्यकता होती है। भारत की इस उपलब्धि को इसी वजह से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
उपग्रह अंतिम कक्षा तक पहुंचने के लिए अपने इंजन का इस्तेमाल करेगा। इसके लिए कक्षा में बदलाव से जुड़ी कई प्रक्रियाएं पूरी की जा सकती हैं।
अंतरिक्ष से पृथ्वी पर रखेगा नजर
EOS-05 एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है। इस तरह के उपग्रह अंतरिक्ष से पृथ्वी की सतह और विभिन्न गतिविधियों की निगरानी करने में सक्षम होते हैं। पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है।
कृषि, प्राकृतिक संसाधन, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन, समुद्री गतिविधियों और मौसम से संबंधित अध्ययनों में सैटेलाइट डेटा बेहद उपयोगी साबित होता है। अत्याधुनिक सेंसर के जरिए पृथ्वी के बड़े भूभाग पर नजर रखी जा सकती है।
उपग्रह के अंतिम कक्षा में पहुंचने और उसकी प्रणालियों के सक्रिय होने के बाद उससे मिलने वाले डेटा का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा।
अमेरिका और चीन के बाद भारत की बड़ी उपलब्धि
इस मिशन के साथ भारत ने अत्याधुनिक अंतरिक्ष निगरानी क्षमता के क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस स्तर की क्षमता अब तक अमेरिका और चीन जैसे देशों के पास प्रमुख रूप से रही है। भारत की उपलब्धि को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में लगातार अपनी क्षमताओं का विस्तार किया है। चंद्रमा और मंगल से जुड़े अभियानों के साथ पृथ्वी अवलोकन, नेविगेशन, संचार और सूर्य के अध्ययन से जुड़े मिशनों में भी भारत ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।
देश के लिए क्यों महत्वपूर्ण है EOS-05
पृथ्वी अवलोकन उपग्रह किसी भी देश के लिए रणनीतिक और नागरिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होते हैं। इनके जरिए बड़े क्षेत्रों की नियमित निगरानी संभव होती है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान प्रभावित इलाकों की स्थिति समझने और राहत एवं बचाव की योजना तैयार करने में भी सैटेलाइट डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और जंगल की आग जैसी घटनाओं के दौरान अंतरिक्ष से मिलने वाली तस्वीरें प्रशासनिक एजेंसियों के लिए मददगार होती हैं। इसी तरह खेती और जल संसाधनों की स्थिति का अध्ययन करने में भी पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसरो की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन
EOS-05 को निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित करना इसरो की प्रक्षेपण क्षमता के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मिशन के दौरान रॉकेट को सही गति, दिशा और ऊंचाई हासिल करनी होती है। थोड़ी सी तकनीकी चूक भी उपग्रह की निर्धारित कक्षा तक की यात्रा को प्रभावित कर सकती है।
18 मिनट के भीतर उपग्रह को निर्धारित कक्षा में पहुंचाने की सफलता मिशन की योजना और उसके क्रियान्वयन की सटीकता को दर्शाती है।
अब अंतिम कक्षा की ओर बढ़ेगा EOS-05
मिशन का अगला महत्वपूर्ण चरण EOS-05 को उसकी अंतिम निर्धारित कक्षा तक पहुंचाना होगा। फिलहाल उपग्रह सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में है। यहां से वह अपने प्रणोदन तंत्र के जरिए धीरे-धीरे अंतिम कक्षा की तरफ बढ़ेगा।
इस दौरान इसरो उपग्रह की स्थिति, उसकी प्रणालियों और कक्षा में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखेगा। अंतिम कक्षा हासिल करने के बाद उपग्रह की विभिन्न प्रणालियों को सक्रिय कर मिशन से जुड़े कार्य शुरू किए जाएंगे।
EOS-05 की सफल लॉन्चिंग भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इससे न केवल पृथ्वी अवलोकन की क्षमता मजबूत होने की उम्मीद है बल्कि अंतरिक्ष में जटिल और उच्च कक्षाओं तक उपग्रह पहुंचाने की भारत की तकनीकी क्षमता भी सामने आई है।





