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ग्रीन अमोनिया से मेथनॉल तक भारत की बड़ी तैयारी

Ratna Netam
24 Sept 2026 6:43 PM IST
ग्रीन अमोनिया से मेथनॉल तक भारत की बड़ी तैयारी
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नई दिल्ली। भारत तेजी से बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के दम पर वैश्विक ग्रीन हाइड्रोजन और स्वच्छ ईंधन बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के मिशन डायरेक्टर अभय बकरे ने कहा है कि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को मजबूत बढ़त हासिल है और देश दुनिया में बेहद प्रतिस्पर्धी दरों पर ग्रीन हाइड्रोजन से बनने वाले विभिन्न उत्पादों का उत्पादन करने की स्थिति में है।ANI से बातचीत में अभय बकरे ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की संभावनाओं, भारत की बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और भविष्य में स्वच्छ ईंधन के निर्यात केंद्र के रूप में देश की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई ऊर्जा आयातक देश अब पारंपरिक ईंधन से स्वच्छ विकल्पों की तरफ बढ़ना चाहते हैं और भारत उनकी जरूरतों को पूरा करने की अच्छी स्थिति में है।
ग्रीन हाइड्रोजन में भारत को मजबूत बढ़त
अभय बकरे ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में भारत के पास मजबूत बढ़त है। इसी वजह से भारत ग्रीन हाइड्रोजन और उससे बनने वाले उत्पादों को प्रतिस्पर्धी दरों पर तैयार करने की क्षमता विकसित कर रहा है।उन्होंने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन से ग्रीन अमोनिया, ग्रीन मेथनॉल और अन्य डेरिवेटिव्स बनाए जा सकते हैं। आने वाले वर्षों में वैश्विक बाजार में इन स्वच्छ ईंधनों की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए भारत अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रहा है।बकरे ने कहा कि ऊर्जा आयात करने वाले संभावित देश अब स्वच्छ ईंधन की ओर बढ़ना चाहते हैं। ऐसे में भारत ग्रीन हाइड्रोजन आधारित ईंधन उपलब्ध कराने की अच्छी स्थिति में है। इसके पीछे देश की विशाल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता महत्वपूर्ण आधार बन रही है।
ग्रीन अमोनिया और मेथनॉल पर फोकस
ग्रीन हाइड्रोजन को केवल सीधे ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं रखा जाता। इससे कई अन्य महत्वपूर्ण उत्पाद भी तैयार किए जा सकते हैं। इनमें ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल प्रमुख हैं।ग्रीन अमोनिया का इस्तेमाल उर्वरक उद्योग के अलावा भविष्य में समुद्री परिवहन जैसे क्षेत्रों में कम कार्बन ईंधन के रूप में किए जाने की संभावनाओं पर काम चल रहा है। इसी तरह ग्रीन मेथनॉल को भी पारंपरिक जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में विभिन्न औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों में इस्तेमाल करने की दिशा में वैश्विक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं।भारत का लक्ष्य अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का उपयोग करके इन उत्पादों की उत्पादन लागत को प्रतिस्पर्धी बनाना है। इससे घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ निर्यात बाजार में भी अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से बड़ी उम्मीद
भारत सरकार ने जनवरी 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दी थी। मिशन के लिए शुरुआती परिव्यय 19,744 करोड़ रुपये रखा गया है। सरकार ने 2030 तक देश में सालाना कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ करीब 125 गीगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ने का लक्ष्य भी रखा गया है।मिशन के तहत सरकार का उद्देश्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन और उससे जुड़े उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। इसके लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग, अनुसंधान एवं विकास, पायलट प्रोजेक्ट और आवश्यक बुनियादी ढांचे पर भी काम किया जा रहा है।
निर्यात के नए अवसर
अभय बकरे के बयान में ग्रीन फ्यूल के निर्यात की संभावनाओं पर विशेष जोर दिया गया। दुनिया के कई देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को डीकार्बोनाइज करने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।लेकिन हर देश के पास बड़े पैमाने पर सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध नहीं है। ऐसे देशों को भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन या उसके डेरिवेटिव्स आयात करने की जरूरत पड़ सकती है। भारत इसी मांग को एक महत्वपूर्ण निर्यात अवसर के रूप में देख रहा है।भारत में सौर और पवन ऊर्जा की व्यापक क्षमता है। यदि इस ऊर्जा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में किया जाता है, तो उत्पादन लागत को कम करने में मदद मिल सकती है। यही भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति प्रदान कर सकता है।
क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन में भारत की भूमिका
भारत की योजना केवल ग्रीन हाइड्रोजन बनाने तक सीमित नहीं है। देश इससे जुड़ी पूरी सप्लाई चेन विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसमें इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, नवीकरणीय बिजली उत्पादन, ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन, स्टोरेज, परिवहन और ग्रीन अमोनिया तथा ग्रीन मेथनॉल जैसे डेरिवेटिव्स का निर्माण शामिल है।यदि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश और उत्पादन क्षमता विकसित होती है तो भारत घरेलू उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन के साथ वैश्विक बाजार को भी स्वच्छ ईंधन उपलब्ध करा सकता है।स्टील, रिफाइनरी, उर्वरक और शिपिंग जैसे क्षेत्रों में ग्रीन हाइड्रोजन और उसके डेरिवेटिव्स के इस्तेमाल को भविष्य में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन उद्योगों में उत्सर्जन कम करने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन को संभावित विकल्पों में शामिल किया गया है।
भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो पर नजर
अभय बकरे ने बातचीत के दौरान आगामी ‘भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो’ का भी उल्लेख किया। इस आयोजन में नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होने की उम्मीद है।इस तरह के आयोजन सरकार, उद्योग, निवेशकों, तकनीकी विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों को एक मंच पर लाने में भूमिका निभाते हैं। ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में बड़े निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को देखते हुए ऐसे मंच भारत की योजनाओं को वैश्विक स्तर पर पेश करने का माध्यम बन सकते हैं।
घरेलू उद्योग को भी मिलेगा फायदा
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य केवल निर्यात बढ़ाना नहीं है। भारत के कई ऊर्जा-गहन उद्योगों में अभी जीवाश्म ईंधन आधारित हाइड्रोजन और अन्य ईंधनों का इस्तेमाल होता है। ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल से इन उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है।सरकार का लक्ष्य है कि जैसे-जैसे उत्पादन बढ़े और तकनीक की लागत कम हो, ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल घरेलू स्तर पर भी तेजी से बढ़े। इससे भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता कम करने की दिशा में भी योगदान मिल सकता है।अभय बकरे के मुताबिक, भारत के लिए सबसे बड़ी ताकत उसकी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और प्रतिस्पर्धी उत्पादन की संभावना है। ग्रीन अमोनिया, ग्रीन मेथनॉल और अन्य हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स की वैश्विक मांग बढ़ने के साथ भारत के सामने नए निर्यात अवसर खुल सकते हैं।नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के जरिए भारत अब इसी क्षमता को बड़े औद्योगिक पैमाने पर विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि उत्पादन, बुनियादी ढांचे और वैश्विक मांग के बीच तालमेल बनता है तो भारत भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन और स्वच्छ ईंधनों की वैश्विक सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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