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New Delhi नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रगति सामने आई है। अमेरिका (US) और ईरान के बीच शांति समझौते (MoU) को अंतिम रूप दिए जाने के बाद क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही है। इस समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति पहले की तुलना में कुछ सामान्य होती दिख रही है।
इसी घटनाक्रम का सीधा असर भारत के व्यापारिक और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर पड़ा है। जानकारी के अनुसार, भारत आने वाले कुल 11 जहाज, जो पहले सुरक्षा कारणों से होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे हुए थे या वहां से गुजरने की प्रतीक्षा कर रहे थे, अब सुरक्षित रूप से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को पार कर चुके हैं। इन जहाजों के सुरक्षित निकलने के बाद भारत की आयात-निर्यात गतिविधियों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर राहत की स्थिति बनी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक तेल आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से की कच्चे तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार और ऊर्जा कीमतों पर असर डाल सकता है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सूत्रों के अनुसार, अभी भी लगभग 10 भारतीय जहाज ऐसे हैं जो होर्मुज क्षेत्र से सुरक्षित रूप से आगे निकलने का इंतजार कर रहे हैं। इन जहाजों की निगरानी लगातार शिपिंग कंपनियों और समुद्री एजेंसियों द्वारा की जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की जोखिमपूर्ण स्थिति से बचा जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच यदि यह समझौता स्थायी रूप से लागू होता है, तो पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता बढ़ेगी। इससे न केवल समुद्री व्यापार सुरक्षित होगा, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला भी सामान्य हो सकती है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति मार्गों पर निर्भर है। होर्मुज जैसे संवेदनशील क्षेत्र में स्थिरता बनी रहने से भारत को लंबे समय में आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकता है।





