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भारतीय नौसेना को मिलेगा नया युद्धपोत 12 अक्टूबर को होगा शामिल
Ratna Netam
9 Oct 2026 7:03 PM IST

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नई दिल्ली। भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), कोच्चि द्वारा निर्मित तीसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) 12 अक्टूबर को भारतीय नौसेना में शामिल किया जाएगा। इसके लिए मुंबई स्थित नेवल डॉकयार्ड में विशेष समारोह आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वत्सायन करेंगे। युद्धपोत का नौसेना में शामिल होना भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।समारोह में भारतीय नौसेना और रक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ रक्षा मंत्रालय तथा कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। इसके अलावा पूर्व सैनिक और स्वदेशी हथियार एवं सेंसर प्रणालियों का निर्माण करने वाली कंपनियों के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। यह आयोजन भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमताओं को मजबूत करने के साथ स्वदेशी रक्षा उद्योग की भूमिका को भी सामने लाएगा।
12 अक्टूबर को मुंबई में होगा समारोह
भारतीय नौसेना में तीसरे एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट को शामिल करने के लिए 12 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई है। यह समारोह मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में आयोजित होगा।इस दौरान पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्सायन कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। नौसेना में किसी नए युद्धपोत का शामिल होना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है, क्योंकि इसके बाद संबंधित पोत नौसेना की परिचालन व्यवस्था का हिस्सा बनता है।इस समारोह में नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति के साथ रक्षा मंत्रालय और निर्माण से जुड़ी संस्थाओं की भागीदारी भी रहेगी।हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इस तीसरे पोत के आधिकारिक नाम, तकनीकी परीक्षणों और समारोह के विस्तृत कार्यक्रम का उल्लेख नहीं किया गया है।
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया निर्माण
इस युद्धपोत का निर्माण केरल के कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है। यह भारत के प्रमुख जहाज निर्माण प्रतिष्ठानों में शामिल है।कोचीन शिपयार्ड समुद्री जहाजों के निर्माण और मरम्मत से जुड़ी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय नौसेना के लिए युद्धपोतों का स्वदेशी निर्माण देश की रक्षा औद्योगिक क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।तीसरे ASW-SWC का निर्माण भी इसी स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता का हिस्सा है।युद्धपोत निर्माण में जहाज के ढांचे, प्रणोदन व्यवस्था, संचार प्रणाली और अन्य तकनीकी उपकरणों का समन्वय आवश्यक होता है। इसके अलावा नौसेना की परिचालन आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न प्रणालियों को एकीकृत किया जाता है।
क्या है एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट?
एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट विशेष प्रकार के नौसैनिक पोत होते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए तैयार किया जाता है।समुद्री सुरक्षा के लिहाज से तटीय और अपेक्षाकृत कम गहराई वाले जलक्षेत्र महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे क्षेत्रों में पनडुब्बियों की गतिविधियों का पता लगाना और उनकी निगरानी करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।इस प्रकार के पोतों को इन्हीं परिस्थितियों में काम करने की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जाता है।एंटी-सबमरीन युद्ध क्षमता का उद्देश्य संभावित पानी के भीतर मौजूद खतरों की पहचान करना, उनकी गतिविधियों की निगरानी करना और आवश्यकता पड़ने पर निर्धारित सैन्य प्रक्रियाओं के अनुसार कार्रवाई करना होता है।ऐसे पोत नौसेना की व्यापक समुद्री निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।
समुद्री सुरक्षा में बढ़ेगी क्षमता
भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों को देखते हुए नौसेना के लिए तटीय सुरक्षा तथा समुद्री निगरानी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।पनडुब्बी रोधी क्षमता समुद्री सुरक्षा के प्रमुख पहलुओं में शामिल है। आधुनिक नौसैनिक अभियानों में सतह पर मौजूद जहाजों के साथ पानी के भीतर होने वाली गतिविधियों की निगरानी भी आवश्यक होती है।शैलो वॉटर क्राफ्ट का उद्देश्य कम गहराई वाले क्षेत्रों में नौसेना की परिचालन क्षमता को मजबूत करना है।इस श्रेणी के पोत समुद्री सुरक्षा से जुड़े अभियानों में अन्य नौसैनिक संसाधनों के साथ समन्वय करके काम कर सकते हैं।हालांकि, नए पोत की विशिष्ट परिचालन तैनाती और जिम्मेदारियों के बारे में उपलब्ध जानकारी में कोई घोषणा नहीं की गई है।
स्वदेशी हथियार और सेंसर निर्माण को महत्व
मुंबई में आयोजित होने वाले समारोह में स्वदेशी हथियार और सेंसर बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया है।नौसैनिक युद्धपोतों में सेंसर प्रणालियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनका उपयोग समुद्री वातावरण से संबंधित जानकारी प्राप्त करने और विभिन्न गतिविधियों की पहचान करने के लिए किया जाता है।पनडुब्बी रोधी अभियानों में पानी के भीतर मौजूद वस्तुओं तथा संभावित खतरों का पता लगाने वाली तकनीक विशेष महत्व रखती है।भारत में रक्षा उपकरणों और सेंसर प्रणालियों के स्वदेशी निर्माण पर जोर दिए जाने से घरेलू रक्षा उद्योग को तकनीकी क्षमताएं विकसित करने के अवसर मिलते हैं।हालांकि, तीसरे ASW-SWC में स्थापित हथियारों और सेंसर प्रणालियों की पूरी सूची उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।
रक्षा मंत्रालय और नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी रहेंगे मौजूद
इस समारोह में रक्षा मंत्रालय, भारतीय नौसेना और रक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा लेंगे।कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के प्रतिनिधियों की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इसी प्रतिष्ठान ने युद्धपोत का निर्माण किया है।इसके अतिरिक्त पूर्व सैनिकों और स्वदेशी रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा।यह आयोजन जहाज निर्माण, रक्षा अनुसंधान और नौसेना की परिचालन जरूरतों से जुड़े विभिन्न संस्थानों की भागीदारी को दर्शाएगा।
आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी युद्धपोतों का निर्माण रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है।देश में जहाज निर्माण की क्षमता विकसित होने से नौसेना की आवश्यकताओं के अनुसार पोतों के डिजाइन, निर्माण और तकनीकी रखरखाव के लिए घरेलू औद्योगिक आधार मजबूत किया जा सकता है।इसके साथ ही भारतीय कंपनियों को रक्षा उपकरणों, प्रणालियों और तकनीकी सेवाओं के क्षेत्र में भागीदारी के अवसर मिलते हैं।कोचीन शिपयार्ड द्वारा निर्मित तीसरे एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट का नौसेना में शामिल होना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगा।12 अक्टूबर को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में होने वाले समारोह के साथ भारतीय नौसेना को एक और स्वदेशी पनडुब्बी रोधी पोत मिलेगा।** इससे उथले समुद्री क्षेत्रों में नौसेना की परिचालन क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही यह आयोजन भारतीय जहाज निर्माण उद्योग और स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास में देश की बढ़ती भागीदारी को भी रेखांकित करेगा।
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