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भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे के एक अध्ययन से पता चला है कि पिछले सात दशकों में उत्तर-पश्चिम भारत अधिक गर्म और शुष्क हो गया है। यहाँ का शुष्क क्षेत्र पूर्व की ओर उत्तर प्रदेश तक फैल गया है, जबकि दक्षिण भारत का बड़ा हिस्सा पहले की तुलना में अधिक नम (गीला) हो गया है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस बदलाव का असर उत्तरी मैदानी इलाकों में धान की खेती, और फसलों की बुवाई व कटाई के समय पर पड़ सकता है, इसलिए इस पर कड़ी नज़र रखने की ज़रूरत है।
उत्तर-पश्चिम भारत (जिसमें पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली शामिल हैं) में, गर्म और अर्ध-शुष्क क्षेत्र का विस्तार हुआ है। 1951–1980 के दौरान यह इस पूरे क्षेत्र के लगभग एक-चौथाई हिस्से में फैला था, जो 1991–2020 के बीच बढ़कर एक-तिहाई हिस्से तक पहुँच गया। तापमान बढ़ने और बारिश कम होने के कारण, इस क्षेत्र का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा शुष्क क्षेत्र में तब्दील हो गया है।
उत्तरी मैदानी इलाकों के शुष्क होने की जाँच करने के लिए, शोधकर्ताओं ने 1981 से 2020 के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार और गंगा के मैदानी इलाकों (पश्चिम बंगाल) में हुई बारिश की तुलना समुद्र के तापमान से की। उन्होंने पाया कि जिन वर्षों में बारिश कम हुई, उनका संबंध 'विक्टोरिया मोड' (Victoria Mode) से था। यह उत्तरी प्रशांत महासागर में गर्म और ठंडे पानी का एक आवर्ती पैटर्न है, जो एक विशेष चरण में नमी को उत्तरी भारत से दूर धकेल देता है।
IMD-पुणे की वैज्ञानिक और इस अध्ययन की मुख्य लेखिका, अनन्या करमाकर ने कहा, "जब हमने 1951 से 2020 तक भारत के जलवायु मानचित्र की हर दशक के आधार पर तुलना की, तो सबसे स्पष्ट बदलाव उत्तर में दिखाई दिया। यहाँ गर्म और शुष्क क्षेत्र पूर्व की ओर उत्तर प्रदेश तक फैल गया है। चूँकि यह देश के सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में से एक है, इसलिए यहाँ बुवाई और कटाई के समय पर कड़ी नज़र रखने की आवश्यकता है।"
यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है जब मानसून में कमी देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस बार मानसून सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रहा, जो 2015 के बाद से सबसे कम है। इसका एक मुख्य कारण 'अल नीनो' (El Niño) था—प्रशांत महासागर के गर्म होने की एक आवर्ती प्रक्रिया, जो अक्सर भारत में मानसून को कमज़ोर कर देती है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के बड़े हिस्सों में सूखे की स्थिति भी घोषित की गई थी। अध्ययन के सह-लेखक और IMD के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि सात दशकों के रिकॉर्ड से पता चलता है कि भारत के जलवायु क्षेत्र एक ही जीवनकाल के भीतर बदल गए हैं।
"इस साल का मानसून सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रहा, जिसका मुख्य कारण 'अल नीनो' था। कई राज्यों में घोषित सूखा यह दिखाता है कि ऐसा साल किसानों पर कितनी बुरी तरह असर डाल सकता है।" उन्होंने कहा, "हमारे सात दशकों के रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि भारत के जलवायु क्षेत्र एक ही जीवनकाल के भीतर बदल गए हैं। उदाहरण के लिए, मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ जैसे इलाकों में अब मानसून के कमजोर रहने पर वहां की जलवायु 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक शुष्क होती है। IMD अब अपने मौसमी पूर्वानुमानों और किसानों के लिए जारी की जाने वाली मौसम संबंधी सलाहों के साथ-साथ, इस दीर्घकालिक स्थिति को भी ध्यान में रखेगा।"
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