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दिल्ली-एनसीआर
आदेश की अवहेलना पर गृह सचिव को व्यक्तिगत पेशी का निर्देश
Ratna Netam
17 Oct 2026 2:38 PM IST

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नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किए जाने के आरोप से जुड़े अवमानना मामले में सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के गृह विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। यह मामला आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक कैदी की सजा में दी गई छूट (रिमिशन) को रद्द करने के फैसले पर पुनर्विचार से संबंधित है। अदालत ने मई 2025 में अधिकारियों को इस मामले में चार सप्ताह के भीतर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। आरोप है कि निर्धारित समय बीत जाने के बावजूद आदेश का पालन नहीं किया गया।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने दिया निर्देश
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद गृह विभाग के सचिव की व्यक्तिगत पेशी का आदेश दिया। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि मई 2025 में पारित आदेश का पालन नहीं होने के कारण अवमानना याचिका दाखिल की गई है।याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि अदालत ने स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की थी, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने निर्धारित अवधि में आवश्यक निर्णय नहीं लिया। इसी आधार पर न्यायालय से हस्तक्षेप करने और आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने की मांग की गई।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सोनकर नामक एक कैदी से जुड़ा है, जो आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। जानकारी के अनुसार, कैदी को पहले सजा में छूट का लाभ दिया गया था। हालांकि, बाद में हत्या के प्रयास के एक मामले में गिरफ्तारी होने के बाद उसकी यह छूट रद्द कर दी गई।छूट रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए सोनकर ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उसने संबंधित अधिकारियों के निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की थी।मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने मई 2025 में आदेश जारी कर संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर छूट रद्द करने के फैसले पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए थे।
चार सप्ताह में कार्रवाई करने का था आदेश
याचिकाकर्ता का कहना है कि न्यायालय के आदेश के बाद भी संबंधित विभाग की ओर से निर्धारित समयसीमा में कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इसी वजह से अदालत के आदेश की अवहेलना का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दाखिल की गई।सुनवाई में यह सवाल प्रमुखता से सामने आया कि न्यायालय द्वारा तय की गई चार सप्ताह की अवधि में आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया। अब गृह विभाग के सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश से मामले में अधिकारियों को अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
सजा में छूट और उसे रद्द करने का मामला
कानूनी रूप से रिमिशन का अर्थ सजा की अवधि में नियमों के अनुसार दी जाने वाली छूट से है। इसका मतलब दोषसिद्धि समाप्त होना नहीं है। सजा में छूट देने और उसे रद्द करने का निर्णय संबंधित कानूनी प्रावधानों तथा निर्धारित शर्तों के आधार पर लिया जाता है।इस मामले में विवाद का मुख्य विषय यह है कि सोनकर को मिली छूट रद्द करने के निर्णय पर न्यायालय के निर्देशानुसार पुनर्विचार हुआ या नहीं।
अब गृह सचिव की पेशी पर नजर
उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद मामले में अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। गृह विभाग के सचिव को अदालत के समक्ष आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट करनी पड़ सकती है।हालांकि, व्यक्तिगत पेशी का निर्देश दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि किसी अधिकारी को अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया है। अदालत आगे प्रस्तुत जवाब, दस्तावेजों और पक्षों की दलीलों के आधार पर निर्णय करेगी।यह मामला न्यायिक आदेशों के समयबद्ध पालन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा है। अब देखना होगा कि दिल्ली सरकार का गृह विभाग अदालत के सामने क्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है।
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