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पार्थ पवार को आरोपी नहीं बनाने पर हाई कोर्ट ने पूछा सवाल

Ratna Netam
1 Oct 2026 6:10 PM IST
पार्थ पवार को आरोपी नहीं बनाने पर हाई कोर्ट ने पूछा सवाल
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मुंबई। पुणे के चर्चित मुंधवा जमीन सौदे को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को पुलिस जांच पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जिस कंपनी ने विवादित जमीन खरीदी, उसमें 99 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले पार्थ पवार को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया, जबकि केवल एक प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले दिग्विजय पाटिल को मामले में आरोपी बनाया गया है। पार्थ पवार महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के बेटे और राज्यसभा सांसद हैं।
जस्टिस माधव जे. जामदार की सिंगल-जज बेंच ने यह टिप्पणी पुणे शहर के निलंबित तहसीलदार सूर्यकांत येवले की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। येवले का नाम मुंधवा जमीन सौदे में कथित अनियमितताओं को लेकर दर्ज एफआईआर में शामिल है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से दाखिल जवाब का जिक्र करते हुए सवाल किया कि जांच अधिकारी का रुख यह है कि कंपनी में 99 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है, जबकि एक प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला व्यक्ति आरोपी है। अदालत ने मौखिक रूप से पूछा कि क्या 99 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले पार्थ पवार इस लेन-देन के लाभार्थी नहीं थे।
मामला पुणे के मुंधवा इलाके में स्थित जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि महार वतन श्रेणी की जमीन, जो सरकार के कब्जे में थी और बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया को लीज पर दी गई थी, उसे अमेडिया एंटरप्राइजेज एलएलपी को बेच दिया गया। आरोप है कि इस जमीन की बिक्री के लिए राज्य सरकार की अनिवार्य मंजूरी नहीं ली गई थी। पार्थ पवार और दिग्विजय पाटिल इस कंपनी से जुड़े हैं।
इस जमीन सौदे को लेकर पहले भी कई सवाल उठ चुके हैं। करीब 40 एकड़ जमीन के लेन-देन को लेकर आरोप लगाया गया था कि इसकी बाजार कीमत लगभग 1,800 करोड़ रुपये थी, लेकिन सौदा करीब 300 करोड़ रुपये में किया गया। इसके साथ ही स्टांप ड्यूटी को लेकर भी विवाद सामने आया था। संबंधित लेन-देन में लगभग 21 करोड़ रुपये की अपेक्षित स्टांप ड्यूटी की जगह केवल 500 रुपये जमा किए जाने का मामला सामने आया था। इन आरोपों और वित्तीय पहलुओं की जांच अलग-अलग स्तर पर की गई।
पुणे पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा इस मामले की जांच कर रही है। एफआईआर में कई लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें निलंबित तहसीलदार सूर्यकांत येवले, दिग्विजय पाटिल और जमीन की पावर ऑफ अटॉर्नी रखने वाली शीतल तेजवानी समेत अन्य नाम शामिल हैं। पार्थ पवार का नाम हालांकि आरोपी के रूप में दर्ज नहीं किया गया।
इसी बात को लेकर हाई कोर्ट पहले भी सवाल उठा चुका है। सितंबर में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक और मामले के जांच अधिकारी को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। उस समय अदालत के सामने यह दलील भी आई थी कि पार्थ पवार प्रभावशाली व्यक्ति हैं और उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है। अदालत ने उस दलील को किसी विशेष पक्ष से जोड़े बिना दर्ज किया था और पुलिस से स्पष्टीकरण मांगा था।
गुरुवार की सुनवाई में महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक सदानंद दाते की ओर से अदालत को बताया गया कि जांच से संबंधित दस्तावेजों की विस्तृत समीक्षा की गई है। इसके बाद यह महसूस किया गया कि मामले में अधिक पेशेवर और विस्तृत जांच की जरूरत है। इसके लिए पुणे के पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार को आगे की जांच कराने के निर्देश दिए गए हैं।
दूसरी ओर सूर्यकांत येवले की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि उनका कथित अपराध में कोई सीधा संबंध नहीं है। उन पर जुलाई 2025 में जमीन से जुड़े कुछ आदेश जारी करने और अधिकारियों को पत्र भेजने के आरोप हैं। बचाव पक्ष का कहना था कि यदि प्रशासनिक आदेश गलत भी था तो उसे उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जा सकती थी और एफआईआर में यह आरोप नहीं है कि आदेश किसी अवैध आर्थिक लाभ के बदले पारित किया गया था।
राज्य सरकार की ओर से येवले की अग्रिम जमानत का विरोध किया गया। अभियोजन पक्ष ने अदालत से कहा कि मामले में आरोप गंभीर हैं और पूछताछ के लिए हिरासत की आवश्यकता है। हालांकि हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पहले मिली अंतरिम गिरफ्तारी सुरक्षा का येवले ने दुरुपयोग नहीं किया था।
इसके बाद अदालत ने जांच में सहयोग करने की शर्त पर सूर्यकांत येवले को अग्रिम जमानत दे दी। इसके बावजूद अदालत की मुख्य चिंता इस बात को लेकर रही कि अमेडिया एंटरप्राइजेज में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले पार्थ पवार की भूमिका को जांच में किस आधार पर अलग रखा गया।
इस बीच पुणे की एक सिविल कोर्ट पहले ही संबंधित जमीन की बिक्री से जुड़ी सेल डीड को रद्द कर चुकी है। जुलाई 2026 में अदालत ने इस दस्तावेज को शुरुआत से ही कानूनी रूप से प्रभावहीन करार दिया था। इसके बाद अमेडिया एंटरप्राइजेज को जमीन पर किसी अधिकार या मालिकाना हित का दावा करने से रोक दिया गया।
मुंधवा जमीन मामला पिछले कई महीनों से महाराष्ट्र की राजनीति और प्रशासन दोनों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब बॉम्बे हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद जांच एजेंसियों पर मामले में सभी संबंधित लोगों की भूमिका की समान रूप से जांच करने का दबाव बढ़ गया है। हालांकि पार्थ पवार को इस मामले में आरोपी नहीं बनाया गया है और उनके खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी स्थापित नहीं हुई है। आगे की जांच और अदालत में पेश होने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही मामले में जिम्मेदारी तय होगी।
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