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CEC और चुनाव आयुक्तों की छूट को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू
Tara Tandi
13 Oct 2026 4:53 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया। यह याचिका 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को दी गई व्यापक छूट (इम्युनिटी) को चुनौती देती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली बेंच (जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे) ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। यह याचिका 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) ने दायर की थी। इसमें उस प्रावधान को चुनौती दी गई है जो मौजूदा और पूर्व CEC और निर्वाचन आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन (या निर्वहन के प्रयास) के दौरान किए गए कार्यों या कही गई बातों के लिए कानूनी कार्यवाही से छूट देता है।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध केस स्टेटस के अनुसार, मामले की अगली सुनवाई के लिए संभावित तारीख 2 नवंबर तय की गई है। धारा 16 में कहा गया है: "किसी अन्य कानून में कुछ भी लिखा होने के बावजूद, कोई भी अदालत किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रखेगी जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है या रहा है, यदि वह कार्यवाही उसके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान या निर्वहन के प्रयास में किए गए किसी कार्य या कही गई बात से संबंधित हो।"
ADR का तर्क है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करता है। उनका कहना है कि संवैधानिक अधिकारियों को इतनी व्यापक सुरक्षा देने से जवाबदेही कम होती है और वे कानून की सामान्य प्रक्रिया से ऊपर हो जाते हैं। याचिका में CEC और निर्वाचन आयुक्तों को दी गई व्यापक छूट पर सवाल उठाया गया है और तर्क दिया गया है कि यह प्रावधान सत्ता के मनमाने इस्तेमाल और भ्रष्टाचार को न्यायिक जांच से बचा सकता है।
यह जनहित याचिका चुनाव आयोग की नियुक्ति और कामकाज को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे की व्यापक न्यायिक जांच के बीच आई है। इस जांच में आयोग की शक्तियों के इस्तेमाल का तरीका और उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे शामिल हैं। 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, ECI और तीन चुनाव आयुक्तों को एक अलग याचिका पर नोटिस जारी किया था। इस याचिका में सवाल उठाया गया था कि क्या CEC ज्ञानेश कुमार अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल या प्रतिनिधित्व कर सकते हैं जो कई सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था को दी गई हैं।
CJI सूर्य कांत और जस्टिस बागची और मोहना की बेंच ने जवाब मांगा था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील विकास सिंह ने आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग का कामकाज उसे नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति एक संस्था के तौर पर ECI को देता है, न कि अकेले काम करने वाले CEC को।
इस बीच, 2023 के उस कानून की संवैधानिक वैधता की भी न्यायिक जांच हो रही है, जिसके तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखा गया है। 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की 2 जजों की बेंच ने इस बात पर बंटा हुआ फैसला सुनाया कि क्या इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ (Constitution Bench) के पास भेजा जाना चाहिए।
जहाँ जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की याचिका खारिज कर दी, वहीं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का मानना था कि इस चुनौती में संवैधानिक व्याख्या का एक अहम सवाल शामिल है और उन्होंने मामले को संविधान पीठ के सामने रखने का समर्थन किया।
दोनों जजों ने निर्देश दिया कि कागजात CJI सूर्य कांत के सामने रखे जाएं ताकि वे 2023 के कानून की वैधता की जांच के लिए संविधान पीठ गठित करने की ज़रूरत पर विचार कर सकें। इस कानून के तहत, चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इसने सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में दिए गए फैसले के तहत तय की गई पिछली अंतरिम व्यवस्था की जगह ली है, जिसमें प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के अलावा CJI भी समिति का हिस्सा थे।
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