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डिमेंशिया पर बढ़ी चिंता नीति में रोकथाम और देखभाल पर जोर

Ratna Netam
27 Sept 2026 6:15 PM IST
डिमेंशिया पर बढ़ी चिंता नीति में रोकथाम और देखभाल पर जोर
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नई दिल्ली। देश में बढ़ती उम्र की आबादी के साथ डिमेंशिया जैसी स्वास्थ्य चुनौतियां भी तेजी से सामने आ रही हैं। शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित ‘होप फॉर डिमेंशिया कॉन्क्लेव 2026’ में नीति-निर्माताओं, डॉक्टरों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने कहा कि भारत को डिमेंशिया की रोकथाम, शुरुआती पहचान और मरीजों की देखभाल करने वाले लोगों यानी केयरगिवर्स को सहायता देने को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में प्राथमिकता देनी चाहिए।इस कॉन्क्लेव का आयोजन ‘होप एक आशा’ (Hope Ek ASHA) संस्था की ओर से किया गया था। संस्था डिमेंशिया से प्रभावित लोगों और उनके परिवारों के साथ काम करते हुए 25 साल पूरे कर रही है। कार्यक्रम में न्यूरोलॉजी, साइकियाट्री, जेरियाट्रिक्स, केयरगिवर ट्रेनिंग और डिमेंशिया सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने चर्चा की कि भारत में डिमेंशिया से जुड़ी बढ़ती जरूरतों को देखते हुए जांच, इलाज, देखभाल और सहायता सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि बीमारी की शुरुआती पहचान से मरीजों और परिवारों को बेहतर तरीके से तैयार होने में मदद मिल सकती है।डिमेंशिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ इसका खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को देखते हुए आने वाले वर्षों में डिमेंशिया से जुड़े मामलों में वृद्धि की संभावना है।
‘होप फॉर डिमेंशिया कॉन्क्लेव 2026’ में इस बात पर जोर दिया गया कि डिमेंशिया को केवल चिकित्सा समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह परिवार, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी चुनौती भी है। मरीजों के साथ-साथ उनके परिवारों और देखभाल करने वालों को भी सहायता और प्रशिक्षण की जरूरत होती है।कार्यक्रम में बताया गया कि डिमेंशिया से प्रभावित व्यक्ति की देखभाल में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कई बार परिवार के सदस्य बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के लंबे समय तक मरीज की देखभाल करते हैं। ऐसे में उन्हें सही जानकारी, भावनात्मक सहयोग और जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना आवश्यक है।विशेषज्ञों ने डिमेंशिया की जांच व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई। उनका कहना है कि अगर बीमारी की पहचान शुरुआती स्तर पर हो जाए तो मरीज की स्थिति को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल सकती है। इसके लिए स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देने और जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
कार्यक्रम में 2023 में ‘अल्जाइमर एंड डिमेंशिया’ जर्नल में प्रकाशित एक राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन का भी उल्लेख किया गया। इस अध्ययन के अनुसार, 60 साल और उससे अधिक उम्र के करीब 7.4 प्रतिशत भारतीय डिमेंशिया से प्रभावित थे। यह संख्या लगभग 88 लाख लोगों के बराबर बताई गई थी।अध्ययन में आबादी में हो रहे बदलाव और बीमारी के मौजूदा स्तर को देखते हुए अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2036 तक भारत में डिमेंशिया से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़कर लगभग 1.69 करोड़ तक पहुंच सकती है। इस अनुमान ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने आने वाली भविष्य की चुनौतियों को रेखांकित किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिमेंशिया के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए केवल अस्पताल आधारित सेवाएं पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए समुदाय स्तर पर जागरूकता, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका और परिवारों को सहायता देने वाली व्यवस्थाओं को भी मजबूत करना होगा।कॉन्क्लेव में न्यूरोलॉजी और मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कहा कि डिमेंशिया को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। कई बार लोग शुरुआती लक्षणों को सामान्य बुढ़ापे का हिस्सा मान लेते हैं, जिससे बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि याददाश्त में लगातार कमी, रोजमर्रा के कामों में परेशानी और व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने से मरीज और परिवार बेहतर तरीके से आगे की योजना बना सकते हैं।कार्यक्रम में जेरियाट्रिक स्वास्थ्य यानी बुजुर्गों की चिकित्सा सेवाओं के विस्तार पर भी चर्चा हुई। बढ़ती उम्र के साथ बुजुर्गों को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है, ऐसे में डिमेंशिया जैसी स्थितियों के लिए विशेष देखभाल व्यवस्था की आवश्यकता बढ़ रही है।
‘होप एक आशा’ संस्था के 25 वर्षों के अनुभव को भी कार्यक्रम में साझा किया गया। संस्था लंबे समय से डिमेंशिया से प्रभावित लोगों और उनके परिवारों के साथ काम कर रही है। इस दौरान मरीजों की देखभाल, परिवारों को सहयोग और जागरूकता बढ़ाने जैसे क्षेत्रों पर काम किया गया है।कार्यक्रम में मौजूद प्रतिनिधियों ने कहा कि डिमेंशिया से निपटने के लिए सरकार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और समुदाय के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। सामूहिक प्रयासों से ही इस बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती का प्रभावी समाधान तैयार किया जा सकता है।
डिमेंशिया के मामलों में वृद्धि को देखते हुए विशेषज्ञों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में इसे अधिक महत्व देने की जरूरत बताई। उनका कहना है कि रोकथाम, शुरुआती पहचान और देखभाल करने वालों की सहायता को स्वास्थ्य योजनाओं का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।कुल मिलाकर ‘होप फॉर डिमेंशिया कॉन्क्लेव 2026’ में भारत में डिमेंशिया की बढ़ती चुनौती पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बीमारी की रोकथाम, समय पर पहचान, मरीजों की बेहतर देखभाल और केयरगिवर्स को सहायता देने के लिए मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करने पर जोर दिया। बढ़ती बुजुर्ग आबादी को देखते हुए आने वाले वर्षों में डिमेंशिया से जुड़ी सेवाओं को विस्तार देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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