दिल्ली-एनसीआर

'दुश्मन की गोली से ज्यादा दर्द दे रहे सरकारी वादे': कारगिल वेटरन सतबीर सिंह की दर्दभरी दास्तान

Saba Naaz
24 July 2026 4:29 PM IST
दुश्मन की गोली से ज्यादा दर्द दे रहे सरकारी वादे: कारगिल वेटरन सतबीर सिंह की दर्दभरी दास्तान
x

बाहरी दिल्ली। देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर रखने वाले वीर जवानों को यदि अपने ही हक और सम्मान के लिए दशकों तक भटकना पड़े, तो यह प्रशासनिक तंत्र और सरकारी वादों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 1999 के कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले दिल्ली के मुखमेलपुर गांव निवासी कारगिल वेटरन लांस नायक सतबीर सिंह पिछले 26 वर्षों से अपने अधिकारों और न्याय के लिए सरकारी दफ्तरों की धूल फांकने को मजबूर हैं।

भारतीय सेना में 13 वर्ष, 11 महीने और 15 दिन तक उत्कृष्ट सेवाएं देने वाले सतबीर सिंह को उनकी बहादुरी के लिए 'विशेष सेवा मेडल' से सम्मानित किया जा चुका है। उनके जीवन की सबसे कठिन और ऐतिहासिक घड़ी 13 जून 1999 की सुबह आई थी, जब वह तोलोलिंग पहाड़ी पर अपनी नौ सदस्यीय टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। महज 15 मीटर की दूरी पर घात लगाकर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों से उनका आमना-सामना हुआ। भीषण गोलीबारी के बीच सतबीर सिंह ने अदम्य साहस दिखाते हुए हैंड ग्रेनेड से हमला कर चार पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया। इस खूनी मुठभेड़ में भारतीय सेना के सात जवान शहीद हो गए, जबकि सतबीर सिंह को तीन गोलियां लगीं।

दुश्मन की एक गोली उनके पैर को चीरती हुई निकल गई, दूसरी जांघ में लगी और तीसरी गोली आज भी उनकी एड़ी में फंसी हुई है। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा संभाले रखा। हालांकि, आज भी एड़ी में फंसी गोली के कारण उन्हें चलने-फिरने में भारी शारीरिक पीड़ा होती है, लेकिन सतबीर सिंह का कहना है कि उन्हें इस शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा तकलीफ सरकार की वादाखिलाफी से पहुंची है।

कारगिल युद्ध के बाद तत्कालीन सरकार ने उनके अभूतपूर्व बलिदान और साहस के सम्मान में पांच बीघा जमीन और एक पेट्रोल पंप आवंटित करने का सार्वजनिक वादा किया था। सतबीर सिंह का आरोप है कि पेट्रोल पंप का आवंटन आज तक कागजों से बाहर नहीं आ सका, जबकि जो पांच बीघा जमीन उन्हें दी गई थी, उसे भी लगभग पांच साल बाद प्रशासन द्वारा वापस ले लिया गया। उन्होंने उस जमीन पर बड़ी उम्मीदों के साथ फलों का बाग लगाया था ताकि परिवार का भरण-पोषण हो सके, लेकिन वह सहारा भी छिन गया।

वर्तमान में सतबीर सिंह को मिलने वाली करीब 40 हजार रुपये की मासिक पेंशन ही उनके छह सदस्यीय परिवार के जीवनयापन का एकमात्र जरिया है। आर्थिक तंगी के कारण उनके दोनों बेटे उच्च शिक्षा से वंचित रह गए, जिसका मलाल उन्हें आज भी सालता है। सतबीर सिंह बताते हैं कि उनकी न्याय से जुड़ी फाइलें पिछले ढाई दशकों से प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन और संबंधित मंत्रालयों के चक्कर काट रही हैं, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका। उनका कहना है कि वे किसी का अहसान नहीं, बल्कि सिर्फ वही सम्मान और अधिकार मांग रहे हैं जिसका वादा देश ने उनसे किया था।

Next Story