दिल्ली-एनसीआर

SIR पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने, मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर बढ़ा राजनीतिक टकराव

Kavita2
7 Oct 2026 9:52 AM IST
SIR पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने, मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर बढ़ा राजनीतिक टकराव
x

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश की राजनीति में टकराव तेज हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं और विपक्षी दल उनकी भूमिका तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा और एनडीए के नेता चुनाव आयोग का बचाव करते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। इस विवाद ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की पारदर्शिता को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

विपक्ष ने SIR की प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है। 6 अक्टूबर को विपक्षी दलों के सांसदों ने दिल्ली में चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी नेता शामिल हुए। पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोका, जिसके बाद नेताओं ने धरना दिया। बाद में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को हिरासत में भी लिया गया।

विपक्ष का आरोप है कि SIR के दौरान मतदाता सूचियों में ऐसे बदलाव हुए हैं, जिनसे बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों की समीक्षा करने और शिकायतों के निपटारे के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की है। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, स्थानांतरित या अपात्र नामों को हटाना नियमित चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है।

इस पूरे विवाद ने विपक्षी दलों को एक साझा मुद्दा भी दिया है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन के अलावा बीजू जनता दल ने भी 6 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शन में भाग लिया। बीजद ने हालांकि स्पष्ट किया कि उसका यह कदम किसी राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनने के बजाय चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े सवालों को लेकर है।

हालांकि विपक्षी खेमे में भी पूरी एकरूपता नहीं दिखाई दी। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक आम आदमी पार्टी और डीएमके इस विशेष प्रदर्शन से दूर रहे। ऐसे में SIR ने विपक्ष को बड़े स्तर पर एक साझा मंच जरूर दिया है, लेकिन सभी विपक्षी दलों की रणनीति एक जैसी नहीं है।

भाजपा और एनडीए नेताओं ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया है कि चुनावी हार के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना विपक्ष की रणनीति बन गई है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह चुनावी नतीजे अपने पक्ष में न होने पर मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनाव आयोग पर सवाल खड़े करती है। वहीं एनडीए के अन्य नेताओं ने भी कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए जरूरी है।

भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के समर्थन में बयान दिए हैं। उनका कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर बिना पर्याप्त प्रमाण के आरोप लगाने से संस्थाओं पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। विपक्ष इसके जवाब में कह रहा है कि चुनाव आयोग से सवाल पूछना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और पारदर्शिता सुनिश्चित करना आयोग की जिम्मेदारी है।

SIR विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि मामला केवल चुनाव आयोग की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा। अब यह सरकार और विपक्ष के बीच व्यापक राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन गया है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था पर भी सरकार को घेरा है।

वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने तर्कों के साथ मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने की है। चुनाव आयोग सीधे सरकार के अधीन संस्था नहीं है, लेकिन विपक्ष इसे भाजपा और केंद्र सरकार से जोड़कर राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। ऐसे में भाजपा और उसके सहयोगी दल लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाना है, न कि किसी विशेष दल को लाभ पहुंचाना।

राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह विवाद आने वाले चुनावों से पहले सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। विपक्ष के लिए यह चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत स्वतंत्रता और मतदाता अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है, जबकि एनडीए इसे चुनाव आयोग के कामकाज पर अनावश्यक राजनीतिक दबाव के रूप में पेश कर रहा है।

इस बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का छत्तीसगढ़ का 7 और 8 अक्टूबर का प्रस्तावित दौरा भी अपरिहार्य कारणों से स्थगित कर दिया गया है। हालांकि इस स्थगन को SIR विवाद से सीधे जोड़ने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

फिलहाल SIR को लेकर राजनीतिक गतिरोध समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा है। विपक्ष ने इस मुद्दे को सड़क से संसद तक उठाने की रणनीति बनाई है, जबकि भाजपा और एनडीए चुनाव आयोग के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है।

इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू जनता का विश्वास है। चाहे विपक्ष के आरोप हों या सत्ता पक्ष का बचाव, अंतिम तौर पर चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि मतदाता सूची की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है और चुनाव आयोग उठाए गए सवालों का कितना स्पष्ट जवाब देता है। इसलिए SIR विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं में जनता के भरोसे से जुड़ी बड़ी बहस बन चुका है।

Next Story