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वेस्ट एशिया तनाव के बीच गैस आपूर्ति नियमों में ढील, सरकार ने प्रतिबंध हटाए

Delhi दिल्ली: सरकार ने पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान लागू किए गए इमरजेंसी नेचुरल गैस सप्लाई रेगुलेशन ऑर्डर के ज्यादातर प्रावधानों को वापस ले लिया है। यह फैसला तब लिया गया है जब सीजफायर के बाद होर्मुज स्ट्रेट से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की लिफ्ट सामान्य रूप से फिर से शुरू हो गई है। इस कदम से देश में गैस सप्लाई व्यवस्था में पहले जैसी स्थिति बहाल होने की उम्मीद जताई जा रही है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शनिवार को एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसके जरिए यह बदलाव किया। मंत्रालय ने नेचुरल गैस (सप्लाई रेगुलेशन) ऑर्डर, 2026 में संशोधन करते हुए कई जरूरी ऑपरेशनल नियमों को हटा दिया है। पहले इन नियमों के तहत देश में प्रोड्यूस नेचुरल गैस और इंपोर्टेड LNG की बिक्री के लिए एक तय सरकारी प्राथमिकता सूची के अनुसार की जानी थी।
अधिकारियों के अनुसार, प्राधिकृत आदेश के तहत अब सप्लाई व्यवस्था को काफी हद तक सामान्य बाजार तंत्र पर छोड़ा जा रहा है। इससे पहले लागू आदेश का उद्देश्य संकट के समय गैस सप्लाई को नियंत्रित करना और प्राथमिक उपभोक्ताओं को सुनिश्चित सप्लाई देना था। लेकिन अब परिस्थितियां सामान्य होने के बाद इन प्रतिबंधों की जरूरत कम मानी गई है।
यह मूल आदेश 9 मार्च को आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत जारी किया गया था। उस समय पश्चिम एशिया क्षेत्र में तनाव बढ़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य से LNG अवरोध आने के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई थी।
होर्मुज जलडमरूमध्य से LNG अवरोध होने के बाद कई सप्लायरों ने फोर्स मेज्योर का हल देते हुए अपने कार्गो को प्राथमिक वाले हैंडओवर की ओर मोड़ दिया था। इस स्थिति में भारत सहित कई देशों को गैस आपूर्ति में अवरोध का सामना करना पड़ा था।
इसी संकट को देखते हुए सरकार ने उस समय आपातकालीन व्यवस्था लागू की थी, जिसके तहत देशों में उपलब्ध प्राकृतिक गैस और आयातित LNG को एक केंद्रीकृत प्राथमिकता सूची के आधार पर वितरित किया जा रहा था। इसका उद्देश्य घरेलू उद्योग, बिजली उत्पादन और आवश्यक सेवाओं को बिना बाधा के गैस आपूर्ति सुनिश्चित करना था।
अब सीजफायर लागू होने और समुद्री परिवहन के फिर से सामान्य होने के बाद LNG अवरोध नियमित हो गया है। आपूर्ति में स्थिरता लौटने के साथ ही सरकार ने माना है कि अब आपातकालीन नियंत्रण व्यवस्था को जारी रखने की आवश्यकता नहीं है।
ऊर्जावान का रुख है कि इस फैसले से गैस बाजार में ज्यादा सप्लाई आएगी और उद्योगों को अपनी जरूरत के अनुसार सप्लाई प्राप्त करने में आसानी होगी। साथ ही यह भी उम्मीद है कि आयात और घरेलू उत्पादन दोनों क्षेत्रों में सामान्य व्यापारिक गतिविधियां फिर से गति पकड़ेगी।
हालांकि, ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का यह भी कहना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है, इसलिए किसी भी संभावित संकट की स्थिति में सरकार को फिर से तेजी से हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
नए संशोधन के बाद गैस आपूर्ति व्यवस्था में सरकारी नियंत्रण कम होगा, लेकिन आपत्ति स्थिति में हस्तक्षेप के अधिकार सरकार के पास बने रहेंगे। इससे एक संतुलित ढांचा तैयार होने की उम्मीद है, जिसमें बाजार की भूमिका और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों का ध्यान रखा जा सके।
कुल मिलाकर यह कदम ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को सामान्य स्थिति में वापस लाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिससे उद्योगों और पोषक तत्वों दोनों को राहत मिलने की संभावना है।





