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वाटर कैनन से पैलेट गन तक, पुलिस के हथियारों का इस्तेमाल कब?

Saba Naaz
29 July 2026 9:36 PM IST
वाटर कैनन से पैलेट गन तक, पुलिस के हथियारों का इस्तेमाल कब?
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नई दिल्ली। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन अपनी बात रखने का एक माध्यम होता है, लेकिन जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक रूप लेने लगता है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे हालात में दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) जैसी एजेंसियां भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कई तरह के गैर-घातक उपकरणों का इस्तेमाल करती हैं। इनमें वाटर कैनन, आंसू गैस और पैलेट गन जैसे साधन शामिल हैं। इनका उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करना होता है, न कि लोगों को गंभीर नुकसान पहुंचाना।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, दंगा नियंत्रण की कार्रवाई एक तय प्रक्रिया के तहत की जाती है। सबसे पहले पुलिस जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। इसके लिए उन्हें विशेष दंगा-रोधी किट उपलब्ध कराई जाती है। इस किट में हेलमेट, पारदर्शी वाइजर, बॉडी प्रोटेक्टर, पॉलीकार्बोनेट शील्ड, आग से बचाने वाली जैकेट और रबर पैड शामिल होते हैं। इन सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल पत्थरबाजी, धारदार हथियारों या अन्य हमलों से जवानों को बचाने के लिए किया जाता है।

भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस सबसे पहले बातचीत और चेतावनी का सहारा लेती है। अधिकारियों के मुताबिक, लाउडस्पीकर के माध्यम से प्रदर्शनकारियों को कानून व्यवस्था बनाए रखने और स्थान खाली करने की अपील की जाती है। यदि इसके बाद भी भीड़ हिंसक बनी रहती है तो पुलिस धीरे-धीरे अगले चरण की कार्रवाई करती है।

पहले चरण में जवान शील्ड और लाठियों की मदद से भीड़ को पीछे हटाने का प्रयास करते हैं। इसके बाद जरूरत पड़ने पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया जाता है। दिल्ली पुलिस के पास मौजूद ‘वरुण’ वाटर कैनन तेज दबाव से पानी की बौछार करता है, जिससे बड़ी संख्या में मौजूद लोगों को एक स्थान से हटाया जा सकता है। इसका उद्देश्य कम से कम नुकसान के साथ भीड़ को नियंत्रित करना होता है।

अगर स्थिति और गंभीर हो जाए और भीड़ लगातार हिंसक गतिविधियां करती रहे तो आंसू गैस के गोले, स्टन ग्रेनेड और मिर्च आधारित रसायन वाले उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। आंसू गैस के प्रभाव से आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और अस्थायी असुविधा होती है, जिससे लोग कुछ समय के लिए आगे बढ़ने या हिंसा करने की स्थिति में नहीं रहते।

इसके अलावा पुलिस अब आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रही है। दंगा नियंत्रण में लॉन्ग रेंज एकॉस्टिक डिवाइस (एलआरएडी) जैसे उपकरण भी शामिल किए गए हैं। यह तेज ध्वनि तरंगें उत्पन्न करता है, जिससे भीड़ को पीछे हटने के लिए मजबूर किया जा सकता है। जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में भी इस तरह की तकनीक का उपयोग किया गया था।

सबसे ज्यादा चर्चा और विवाद पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर होता है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पैलेट गन का उपयोग अंतिम विकल्प के तौर पर किया जाता है। इसके इस्तेमाल के लिए दूरी और निशाने से जुड़े दिशा-निर्देश तय होते हैं। अधिकारियों का कहना है कि इसे कम से कम 50 मीटर की दूरी से और शरीर के निचले हिस्से की ओर निशाना बनाकर चलाने के निर्देश दिए जाते हैं। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों ने कई बार इसके इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि गलत तरीके से उपयोग करने पर गंभीर चोट लगने की संभावना रहती है।

दुनिया के कई देशों में भीड़ नियंत्रण के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाई जाती हैं। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में धातु के पैलेट की जगह स्पंज ग्रेनेड, बीन बैग राउंड और अन्य गैर-घातक विकल्पों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं जर्मनी जैसे देशों में वाटर कैनन का बड़े स्तर पर प्रयोग किया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भीड़ नियंत्रण में केवल आधुनिक उपकरण ही पर्याप्त नहीं होते, बल्कि सही समय पर मिलने वाली खुफिया जानकारी भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। अगर हिंसा फैलाने वाले तत्वों की पहचान पहले ही कर ली जाए तो हालात को बिगड़ने से रोका जा सकता है।

कानून व्यवस्था बनाए रखने और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसलिए वाटर कैनन, आंसू गैस और पैलेट गन जैसे उपकरणों का इस्तेमाल तय नियमों और जवाबदेही के साथ किया जाना जरूरी माना जाता है।

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