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SIR पर जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर पूर्व CJI गवई ने जताई आपत्ति
Ratna Netam
6 Oct 2026 2:52 PM IST

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नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां द्वारा सार्वजनिक मंच से की गई टिप्पणी पर सवाल उठाया है। गवई ने कहा कि न्यायिक अनुशासन और मर्यादा किसी कार्यरत या रिटायर जज को ऐसे मामले पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देती, जो अदालत में विचाराधीन हो।
गवई की यह प्रतिक्रिया जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के उस बयान के बाद सामने आई है, जिसमें उन्होंने मताधिकार से जुड़े सवालों और बड़ी संख्या में लोगों के मतदाता सूची से बाहर होने की आशंका पर चिंता जताई थी। जस्टिस भुइयां ने हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो लाखों नागरिकों को मताधिकार से वंचित करती है, वह संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल पैदा करती है।
पूर्व CJI गवई ने कहा कि जब कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हो और उस पर न्यायिक विचार चल रहा हो, तब न्यायाधीशों को सार्वजनिक मंचों से उस विषय पर ऐसी टिप्पणी से बचना चाहिए, जिसे मामले के गुण-दोष पर राय के रूप में देखा जा सके। उन्होंने न्यायिक निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।
गवई के मुताबिक, न्यायपालिका में अनुशासन केवल अदालत कक्ष तक सीमित नहीं होता। जजों के सार्वजनिक वक्तव्यों को भी इस नजरिए से देखा जाता है कि कहीं उनका असर लंबित मामलों की धारणा या न्यायिक प्रक्रिया पर तो नहीं पड़ रहा। उन्होंने कहा कि जब वही मुद्दा अदालत के समक्ष निर्णय के लिए लंबित हो, तो सार्वजनिक टिप्पणी से बचना न्यायिक मर्यादा का हिस्सा है।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को NALSAR में 19वें जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में अपने विचार रखे थे। उन्होंने मतदान के अधिकार और नागरिकों की समानता के संदर्भ में कहा था कि संविधान दो तरह के नागरिकों की परिकल्पना नहीं करता—एक जिन्हें मतदान का अधिकार हो और दूसरे जिन्हें यह अधिकार न मिले।
उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई जब चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इन याचिकाओं में मतदाता सूची के पुनरीक्षण, नाम हटाए जाने और पूरी प्रक्रिया की वैधानिकता तथा पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को सटीक और अद्यतन रखना है, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से पात्र मतदाताओं के बाहर होने की आशंका जताई गई है।
इस मामले में केवल बी.आर. गवई ही नहीं, बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर जज एस.एन. ढींगरा और आर.एस. सोढ़ी ने भी जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए हैं। ढींगरा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के किसी कार्यरत जज को लंबित मामले पर सार्वजनिक बयान देते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। वहीं आर.एस. सोढ़ी ने कहा कि मतदान का अधिकार लागू कानूनी ढांचे और पात्रता की शर्तों के तहत तय होता है।
एस.एन. ढींगरा ने यह भी कहा कि अगर चुनाव आयोग के भीतर SIR से संबंधित फैसलों को लेकर मतभेद थे, तो संबंधित चुनाव आयुक्त स्वयं अपनी स्थिति स्पष्ट करने में सक्षम हैं। उनका कहना था कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों की ओर से उनकी स्थिति स्पष्ट करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की जरूरत नहीं है।
उधर, सुप्रीम कोर्ट में SIR से जुड़े मामलों की सुनवाई जारी है। अदालत ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि महत्वपूर्ण फैसले आयोग के तीन सदस्यीय ढांचे में सामूहिक रूप से लिए गए थे या नहीं। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि कोई निर्णय कानून के अनुरूप नहीं पाया जाता या निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
SIR से जुड़ा फॉर्म-6 का मामला भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है। अदालत ने हाल में स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को मंजूरी नहीं दी थी और इस संबंध में चुनाव आयोग से रिपोर्ट मांगी गई है। यह मुद्दा भी मतदाता पंजीकरण और पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद का हिस्सा बन गया है।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी को विपक्षी दलों ने मतदाता अधिकारों से जुड़े अपने सवालों के समर्थन में उद्धृत किया है, जबकि पूर्व न्यायाधीशों ने इसे न्यायिक मर्यादा के नजरिए से देखा है। इस वजह से मामला केवल SIR की वैधानिकता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि न्यायाधीशों द्वारा लंबित मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी की सीमा को लेकर भी बहस शुरू हो गई है।
न्यायिक व्यवस्था में यह स्थापित सिद्धांत माना जाता है कि अदालत के समक्ष लंबित मामलों पर न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियां अत्यधिक सावधानी से की जानी चाहिए। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और उस पर जनता के विश्वास को बनाए रखना है। बी.आर. गवई ने इसी पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि कार्यरत और रिटायर दोनों तरह के न्यायाधीशों को न्यायिक अनुशासन का ध्यान रखना चाहिए।
फिलहाल SIR का मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की ओर से जवाब तथा अदालत की टिप्पणियां इस विवाद की दिशा तय कर सकती हैं। वहीं जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की सार्वजनिक टिप्पणी और पूर्व CJI बी.आर. गवई की प्रतिक्रिया ने न्यायिक मर्यादा और सार्वजनिक अभिव्यक्ति की सीमा को लेकर एक अलग बहस को जन्म दे दिया है।
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