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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में दिव्यांग श्रेणी के तहत फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए छात्रों का दाखिला कराने वाले एक कथित अंतरराज्यीय गिरोह का दिल्ली पुलिस ने पर्दाफाश किया है। नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट की स्पेशल स्टाफ यूनिट ने इस मामले में नौ संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, गिरोह दिव्यांग व्यक्तियों (PwD) के नाम पर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कर छात्रों को विश्वविद्यालय में धोखाधड़ी से प्रवेश दिलाने का काम करता था। कार्रवाई के दौरान 27 कथित फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र बरामद किए गए हैं।
पुलिस की इस कार्रवाई के बाद विश्वविद्यालयों में आरक्षित श्रेणियों के अंतर्गत प्रवेश के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले दस्तावेजों की सत्यता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि दिव्यांग श्रेणी के तहत दाखिले की व्यवस्था वास्तविक पात्रता रखने वाले विद्यार्थियों के लिए बनाई गई है। यदि फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर प्रवेश हासिल किया जाता है, तो इससे पात्र छात्रों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट की स्पेशल स्टाफ यूनिट की कार्रवाई
दिल्ली पुलिस के अनुसार, नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट की स्पेशल स्टाफ यूनिट ने एक ऐसे गिरोह का खुलासा किया है, जो कथित रूप से फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनाकर दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला कराने में शामिल था।
पुलिस ने इस मामले में कुल नौ संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। कार्रवाई के दौरान 27 फर्जी बताए जा रहे प्रमाणपत्र भी बरामद किए गए हैं।
गिरोह के अंतरराज्यीय होने की जानकारी भी पुलिस ने दी है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि गिरोह किन-किन राज्यों में सक्रिय था और इसके सदस्य किस तरह छात्रों या उनके अभिभावकों से संपर्क करते थे।
पुलिस की कार्रवाई से यह मामला सामने आया है, लेकिन गिरोह की पूरी कार्यप्रणाली और सभी गिरफ्तार व्यक्तियों की भूमिका का विस्तृत विवरण अभी उपलब्ध नहीं है।
फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए दाखिला कराने का आरोप
पुलिस के मुताबिक, गिरोह दिव्यांग व्यक्तियों के लिए निर्धारित श्रेणी का गलत इस्तेमाल करके छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाने का प्रयास करता था।
इसके लिए कथित रूप से फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र तैयार किए जाते थे। इन दस्तावेजों के माध्यम से छात्रों को ऐसे प्रवेश लाभ दिलाने की कोशिश की जाती थी, जिनके लिए वास्तविक पात्रता आवश्यक होती है।
विश्वविद्यालयों में दिव्यांग श्रेणी के अंतर्गत प्रवेश की व्यवस्था उन विद्यार्थियों के लिए होती है, जो निर्धारित नियमों और पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं।
ऐसे में यदि कोई छात्र गलत दस्तावेज प्रस्तुत करके इस श्रेणी का लाभ लेने की कोशिश करता है, तो इससे प्रवेश प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, इस मामले में कितने छात्रों ने कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया और कितनों को वास्तव में दाखिला मिला, इसका स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है।
पुलिस ने बरामद किए 27 फर्जी प्रमाणपत्र
पुलिस ने कार्रवाई के दौरान 27 कथित फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र बरामद करने की जानकारी दी है।
ये प्रमाणपत्र मामले की जांच के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज हो सकते हैं। इनके आधार पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दस्तावेज किसके नाम पर तैयार किए गए थे और उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाना था।
इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रमाणपत्र किन संस्थानों के नाम पर जारी दिखाए गए थे और उनकी वास्तविकता क्या है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में प्रमाणपत्रों पर दर्ज नामों, उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया या उनके इस्तेमाल से जुड़े सभी विवरण नहीं दिए गए हैं।
बरामद दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि कथित धोखाधड़ी का दायरा कितना बड़ा था।
नौ संदिग्धों की गिरफ्तारी से जांच को मिला आधार
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में नौ संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, ये लोग कथित अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े हुए हैं।
गिरफ्तारी के बाद मामले में संबंधित व्यक्तियों की भूमिका, दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया और दाखिले के लिए उनका इस्तेमाल किए जाने के आरोपों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
हालांकि, गिरफ्तार संदिग्धों के नाम, उनकी अलग-अलग भूमिकाएं और उनके खिलाफ दर्ज धाराओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
यह भी स्पष्ट नहीं है कि गिरोह कथित फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करने के बदले कितनी रकम लेता था।
इसलिए फिलहाल किसी निश्चित रकम या गिरोह से जुड़े अतिरिक्त व्यक्तियों की संख्या का दावा करना उचित नहीं होगा।
नर्सरी एडमिशन में भी सामने आया था ऐसा मामला
दिल्ली में फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र से जुड़ा यह पहला मामला नहीं है।
इससे पहले अक्टूबर में दिल्ली पुलिस ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए नर्सरी प्रवेश से संबंधित एक मामले में प्राथमिकी दर्ज की थी।
उस मामले में आरोप था कि 'चिल्ड्रन विद स्पेशल नीड्स' (CWSN) श्रेणी के अंतर्गत नर्सरी में दाखिला पाने के लिए कथित रूप से फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र जमा किए गए थे।
नर्सरी प्रवेश से जुड़े इस मामले और दिल्ली विश्वविद्यालय में सामने आए कथित गिरोह की कार्रवाई में एक समान पहलू दिव्यांगता प्रमाणपत्रों के गलत इस्तेमाल का आरोप है।
हालांकि, दोनों मामलों के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं की गई है। इसलिए इन्हें एक ही गिरोह की गतिविधि मानना उचित नहीं होगा।
पात्र दिव्यांग विद्यार्थियों के अधिकारों का सवाल
दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए प्रवेश में निर्धारित प्रावधानों का उद्देश्य उन्हें शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना है।
इन व्यवस्थाओं का लाभ केवल निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले विद्यार्थियों को मिलना चाहिए। यदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कोई व्यक्ति प्रवेश प्राप्त करता है, तो इससे वास्तविक पात्र विद्यार्थियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े इस मामले में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई ने दस्तावेजों के सत्यापन की आवश्यकता को सामने रखा है।
शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के दौरान प्रस्तुत प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है, ताकि किसी भी श्रेणी का गलत इस्तेमाल रोका जा सके।
गिरोह के नेटवर्क और दाखिलों की जांच महत्वपूर्ण
दिल्ली पुलिस की नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट स्पेशल स्टाफ यूनिट ने नौ संदिग्धों को गिरफ्तार कर 27 कथित फर्जी प्रमाणपत्र बरामद किए हैं।
अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि गिरोह ने कितने छात्रों के लिए प्रमाणपत्र तैयार किए और इनके आधार पर कितने दाखिले कराए गए।
इसके अलावा कथित गिरोह के अंतरराज्यीय नेटवर्क और दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़े तथ्य भी जांच के महत्वपूर्ण विषय होंगे।
फिलहाल, पुलिस की कार्रवाई में एक बड़े कथित प्रवेश धोखाधड़ी गिरोह का खुलासा हुआ है। मामले में गिरफ्तार व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगी।





