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भारत के कानून पर बाहरी दखल मंजूर नहीं FCRA विवाद पर विदेश मंत्रालय का बयान

Ratna Netam
7 Aug 2026 9:41 PM IST
भारत के कानून पर बाहरी दखल मंजूर नहीं FCRA विवाद पर विदेश मंत्रालय का बयान
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नई दिल्ली : विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) को लेकर अमेरिका और कुछ अन्य देशों की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर भारत ने कड़ा रुख अपनाया है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यह पूरी तरह भारत का आंतरिक विषय है और इस पर निर्णय लेने का अधिकार केवल भारतीय संसद को है। विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी विदेशी देश को भारत की विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
शुक्रवार को आयोजित नियमित मीडिया ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से जब FCRA संशोधन विधेयक पर अमेरिका और अन्य देशों की टिप्पणियों को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारत ने इन प्रतिक्रियाओं पर ध्यान दिया है, लेकिन यह मामला पूरी तरह देश का आंतरिक विषय है। उन्होंने कहा कि भारत की संसद कानून बनाने के लिए सक्षम और स्वतंत्र है तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत ही सभी विधेयकों पर विचार किया जाता है।
रणधीर जायसवाल ने कहा कि दुनिया के कई देशों में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए कानून मौजूद हैं। उन्होंने विशेष रूप से अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन के उपयोग और निगरानी के लिए सख्त कानूनी प्रावधान लागू हैं। ऐसे में भारत द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए विदेशी फंडिंग को विनियमित करने को लेकर सवाल उठाना उचित नहीं है।
दरअसल, हाल के दिनों में अमेरिका समेत कुछ देशों के नेताओं ने प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक पर चिंता व्यक्त की थी। उनका दावा था कि नए प्रावधानों का सबसे अधिक असर ईसाई चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ेगा। उनका कहना था कि यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द या नवीनीकृत नहीं किया जाता है तो उसके विदेशी फंड और संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है, जिससे धार्मिक और सामाजिक संगठनों के कामकाज पर असर पड़ेगा।
अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने भी इस मुद्दे पर भारत सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने बयान जारी कर कहा था कि प्रस्तावित संशोधन ईसाई समुदाय के खिलाफ हैं और यदि इन्हें लागू किया गया तो भारत-अमेरिका संबंधों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मूर ने यह भी दावा किया था कि सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं के संचालन में हस्तक्षेप कर सकती है, यदि उनका FCRA पंजीकरण रद्द हो जाए।
भारत सरकार ने हालांकि इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय या संस्था को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि भारत का संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचा पूरी तरह सक्षम है तथा कानून बनाने की प्रक्रिया संसद के माध्यम से पारदर्शी तरीके से संचालित होती है।
प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य मौजूदा विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में बदलाव करना है। यह कानून देश में गैर-सरकारी संगठनों, ट्रस्टों, धार्मिक संस्थाओं और अन्य संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे के नियमन से जुड़ा है। सरकार का कहना है कि विदेशी फंडिंग का उपयोग देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनहित के खिलाफ न हो, इसके लिए कानून को और प्रभावी बनाया जा रहा है।
संशोधन विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि यदि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, सरेंडर कर दिया जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो सरकार द्वारा अधिकृत प्राधिकरण उस संस्था की विदेशी फंडिंग और उससे जुड़ी संपत्तियों का अस्थायी प्रबंधन कर सकेगा। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और संबंधित संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर देश के भीतर भी राजनीतिक बहस जारी है। विपक्ष के कुछ दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इस पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि यह कानून केवल जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। फिलहाल भारत ने अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को स्पष्ट शब्दों में खारिज करते हुए यह संदेश दिया है कि देश के विधायी मामलों में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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