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SIR पर अंदरूनी मतभेद की खबरों को चुनाव आयोग ने किया खारिज

Kavita2
23 Sept 2026 2:46 PM IST
SIR पर अंदरूनी मतभेद की खबरों को चुनाव आयोग ने किया खारिज
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नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने बुधवार को मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर आयोग के तीन सदस्यों के बीच अंदरूनी मतभेद होने की खबरों को खारिज किया। आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि SIR समेत चुनाव आयोग द्वारा लिए गए सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए और इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी शामिल थी।

यह स्पष्टीकरण एक जांच रिपोर्ट के बाद सामने आया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ कदमों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज की थीं। ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनावी डेटाबेस के संचालन जैसे विषयों से संबंधित बताई गई हैं।

आयोग ने कहा अंतिम फैसलों पर नहीं था मतभेद


चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आयोग के भीतर विभिन्न प्रस्तावों पर विचार-विमर्श के दौरान चुनाव आयुक्त सुझाव और टिप्पणियां देते हैं। इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाना होता है।

आयोग के मुताबिक इस तरह के सुझावों को अंतिम फैसलों पर असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सूत्रों ने कहा कि SIR सहित अंतिम रूप से लिए गए सभी महत्वपूर्ण निर्णय तीनों सदस्यों की सहमति से हुए।

इस स्पष्टीकरण के जरिए आयोग ने उन खबरों को चुनौती दी है जिनमें उसके शीर्ष स्तर पर गंभीर अंदरूनी मतभेद की बात कही गई थी।

रिपोर्ट में 14 आपत्तियों का दावा

सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार इनमें कुछ ऐसे कदम भी शामिल थे जो कथित तौर पर दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना उठाए गए थे।

रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया है उनमें नए मतदाताओं को जोड़ना, मतदाता सूची से नाम हटाना, हटाए गए नामों को बहाल करने की प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम तक पहुंच शामिल है।

हालांकि आयोग का कहना है कि आंतरिक स्तर पर उठाए गए सवालों और अंतिम फैसले के बीच अंतर किया जाना चाहिए।

Form-6 में बदलाव पर उठे थे सवाल

रिपोर्ट में मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए एक बदलाव का भी उल्लेख है।

SIR से संबंधित एक घोषणा Form-6 में जोड़ी गई थी। इसमें आवेदक से यह बताने को कहा गया कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा था कि वैधानिक Form-6 में इस तरह का बदलाव नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस राय से सहमति जताई थी।

बाद में संधू ने कथित तौर पर इस बदलाव को हटाने की बात कही थी।

मतदाता डेटाबेस को लेकर भी जताई गई चिंता

जांच रिपोर्ट में एक अन्य प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम के नियंत्रण का बताया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण और राज्य स्तर के अधिकारियों की डिजिटल पहुंच सीमित होने को लेकर चिंता जताई थी।

मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने में Electoral Registration Officer यानी ERO की महत्वपूर्ण वैधानिक भूमिका होती है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कुछ परिस्थितियों में डिजिटल सिस्टम के संचालन को लेकर सवाल उठाए गए थे।

दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से इस विषय पर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे जाने का दावा भी रिपोर्ट में किया गया है।

चुनाव आयोग ने आपत्तियों को बताया प्रक्रिया का हिस्सा

दूसरी तरफ आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों और चुनाव आयुक्तों की ओर से सुझाव देना या किसी प्रस्ताव के पहलुओं पर सवाल उठाना संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है।

आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि आखिर में जो निर्णय लागू किए गए वे सर्वसम्मति से लिए गए। यानी आयोग के अनुसार आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान किसी विषय पर सवाल या सुझाव सामने आने को अंतिम फैसले पर औपचारिक असहमति नहीं माना जाना चाहिए।

कानून में क्या है व्यवस्था?

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के कामकाज से जुड़े 2023 के कानून में आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया का प्रावधान है।

कानून के अनुसार आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से संचालित किया जाना चाहिए। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त किसी विषय पर अलग-अलग राय रखते हैं तो फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाता है।

इसी वजह से आयोग के भीतर दर्ज की गई कथित आपत्तियों और अंतिम निर्णयों की प्रकृति को लेकर अब बहस हो रही है।

SIR को लेकर पहले से जारी है बहस

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का उद्देश्य मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा करना है। इस प्रक्रिया में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, अपात्र या मृत मतदाताओं के नाम हटाने, स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान करने और रिकॉर्ड को अपडेट करने जैसे काम शामिल होते हैं।

SIR की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और अन्य पक्षों की ओर से लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। खास तौर पर मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम बाहर होने और दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया बहस का विषय रही है।

आयोग अपनी ओर से मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखने की आवश्यकता पर जोर देता रहा है।

आंतरिक चर्चा और अंतिम फैसले पर अलग-अलग दावे

इस पूरे विवाद में दो अलग पहलू सामने आए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट आयोग के भीतर रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों को सामने रखती है, जबकि चुनाव आयोग का पक्ष है कि विचार-विमर्श के दौरान सुझाव और सवाल उठना सामान्य है और उसके सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

इसलिए यह कहना कि कोई आंतरिक आपत्ति दर्ज ही नहीं हुई और यह कहना कि अंतिम फैसले असहमति से लिए गए, दोनों अलग बातें हैं। उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक संधू और जोशी की ओर से कुछ कदमों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा है, जबकि आयोग अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत बता रहा है।

चुनाव आयोग के कामकाज पर बढ़ी चर्चा

रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज और SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हुई है। विपक्षी नेताओं ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं।

वहीं आयोग की ओर से सामने आए स्पष्टीकरण में अंतिम निर्णयों की सर्वसम्मति पर जोर दिया गया है।

अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि आंतरिक स्तर पर दर्ज सुझावों और आपत्तियों को अंतिम निर्णय प्रक्रिया में किस तरह संबोधित किया गया। फिलहाल चुनाव आयोग ने साफ किया है कि SIR सहित उसके अंतिम फैसले तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए हैं, जबकि मीडिया रिपोर्ट में कुछ प्रक्रियागत कदमों पर दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का दावा किया गया है।

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