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DUSU चुनाव 2026: 17 सितंबर को वोटिंग के आसार, छात्र राजनीति हुई सक्रिय

nidhi
8 Aug 2026 6:19 AM IST
DUSU चुनाव 2026: 17 सितंबर को वोटिंग के आसार, छात्र राजनीति हुई सक्रिय
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17 सितंबर को हो सकता है मतदान, छात्र संगठनों ने कसी कमर

नई दिल्ली : दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU चुनाव को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में एक बार फिर राजनीतिक और छात्र गतिविधियां तेज होती नजर आ रही हैं। छात्र संगठनों के बीच बैठकों का दौर शुरू हो गया है और संभावित उम्मीदवारों ने भी छात्रों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। चर्चा है कि इस बार DUSU चुनाव के लिए 17 सितंबर को मतदान कराया जा सकता है। हालांकि, मतदान की तारीख को लेकर अंतिम आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

DUSU चुनाव दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे चर्चित छात्र चुनावों में से एक माना जाता है। हर वर्ष हजारों छात्र इस चुनाव में हिस्सा लेते हैं और विभिन्न छात्र संगठन अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव तथा संयुक्त सचिव जैसे प्रमुख पदों के लिए अपने उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं। चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस से लेकर अलग-अलग कॉलेज परिसरों तक राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगती हैं।
इस बार भी संभावित चुनावी कार्यक्रम को लेकर छात्रों और छात्र संगठनों के बीच उत्सुकता बढ़ गई है। अगर 17 सितंबर को मतदान होता है, तो आने वाले हफ्तों में कैंपस की राजनीति और अधिक सक्रिय होने की संभावना है।
17 सितंबर को मतदान की चर्चा से बढ़ी हलचल
DUSU चुनाव के लिए 17 सितंबर की तारीख संभावित बताए जाने के बाद छात्र संगठनों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। हालांकि, जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन या चुनाव से संबंधित आधिकारिक प्राधिकरण की ओर से कार्यक्रम जारी नहीं किया जाता, तब तक इसे अंतिम तारीख नहीं माना जा सकता।
संभावित मतदान की तारीख ने छात्र संगठनों को अपनी रणनीति बनाने का पर्याप्त समय भी दिया है। संगठन अब संभावित उम्मीदवारों की पहचान, छात्र मुद्दों की सूची और चुनावी अभियान की रूपरेखा तैयार करने में जुट सकते हैं।
विश्वविद्यालय की राजनीति में DUSU चुनाव की खास अहमियत है। चुनाव केवल चार केंद्रीय पदों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अलग-अलग कॉलेजों में भी छात्र राजनीति को प्रभावित करता है। यही वजह है कि चुनाव की घोषणा से पहले ही छात्र संगठनों के बीच गतिविधियां बढ़ने लगती हैं।
उम्मीदवारों के चयन पर सबकी नजर
DUSU चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा उम्मीदवारों के चयन को लेकर होती है। अध्यक्ष पद समेत अन्य केंद्रीय पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन छात्र संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला होता है।
किस उम्मीदवार की कैंपस में स्वीकार्यता अधिक है, कौन छात्रों की समस्याओं को बेहतर तरीके से उठा सकता है और किसका संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत है—इन तमाम पहलुओं को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों के नाम तय किए जाते हैं।
संभावित चुनाव कार्यक्रम सामने आने के साथ ही छात्र संगठनों के भीतर भी बैठकों का दौर तेज होने की उम्मीद है। कई छात्र नेता पहले से ही विभिन्न कॉलेजों में छात्रों से संपर्क बढ़ा रहे हैं।
किन मुद्दों पर हो सकता है चुनाव?
DUSU चुनाव में हर साल कई मुद्दे प्रमुखता से सामने आते हैं। इस बार भी छात्रों से जुड़े बुनियादी और शैक्षणिक मुद्दे चुनावी बहस का केंद्र बन सकते हैं।
फीस में बढ़ोतरी, छात्रवृत्ति, हॉस्टल की उपलब्धता, परिवहन, कैंपस में सुरक्षा, पुस्तकालय की सुविधाएं, परीक्षा व्यवस्था, प्लेसमेंट और इंटर्नशिप जैसे मुद्दे छात्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसके अलावा कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं, कैंटीन, साफ-सफाई, पेयजल, इंटरनेट और खेल सुविधाओं से जुड़े सवाल भी चुनावी अभियान का हिस्सा बन सकते हैं।
छात्र संगठन आमतौर पर अपने घोषणापत्र में इन मुद्दों को शामिल करते हैं और छात्रों से वादे करते हैं कि चुनाव जीतने के बाद वे विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने उनकी समस्याओं को मजबूती से उठाएंगे।
फीस और शिक्षा से जुड़े मुद्दे अहम
दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों के लिए शिक्षा की लागत एक महत्वपूर्ण विषय है। फीस, परीक्षा शुल्क और अन्य शैक्षणिक खर्चों को लेकर छात्र संगठन अक्सर अपनी आवाज उठाते रहे हैं।
यदि इस बार भी फीस या अन्य शैक्षणिक खर्चों में बढ़ोतरी का मुद्दा सामने आता है, तो यह चुनावी बहस का प्रमुख विषय बन सकता है। छात्र संगठन प्रशासन से पारदर्शिता और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए अधिक सहायता की मांग कर सकते हैं।
छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। कई छात्रों के लिए समय पर स्कॉलरशिप मिलना उनकी पढ़ाई जारी रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में चुनावी घोषणापत्रों में छात्रवृत्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के वादे दिखाई दे सकते हैं।
हॉस्टल और आवास का मुद्दा
दिल्ली विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्र देश के अलग-अलग हिस्सों से पढ़ने आते हैं। ऐसे छात्रों के लिए हॉस्टल और किफायती आवास की उपलब्धता लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दा रही है।
कैंपस के आसपास किराए के मकानों और पीजी की बढ़ती लागत के बीच छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की जरूरत बढ़ी है। DUSU चुनाव में छात्र संगठन इस विषय को भी प्रमुखता से उठा सकते हैं।
विशेष रूप से नए छात्रों के लिए हॉस्टल की उपलब्धता और पारदर्शी आवंटन व्यवस्था को लेकर मांगें सामने आ सकती हैं।
महिला छात्रों की सुरक्षा पर भी जोर
कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा चुनावी राजनीति का एक अहम मुद्दा हो सकती है। कॉलेजों के आसपास पर्याप्त रोशनी, सुरक्षित परिवहन, सीसीटीवी कैमरे, हेल्प डेस्क और शिकायत निवारण व्यवस्था जैसे विषयों पर छात्र संगठन अपना रुख स्पष्ट कर सकते हैं।
महिला छात्रों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक कैंपस वातावरण सुनिश्चित करना विश्वविद्यालय प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। छात्र संगठन इस मुद्दे को अपने अभियान का हिस्सा बनाकर प्रशासन से जवाबदेही की मांग कर सकते हैं।
रोजगार और प्लेसमेंट भी बड़ा मुद्दा
आज के दौर में विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए पढ़ाई के साथ रोजगार और करियर के अवसर भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में DUSU चुनाव में प्लेसमेंट और इंटर्नशिप के मुद्दे को भी प्रमुखता मिल सकती है।
छात्र संगठनों की ओर से कंपनियों के साथ बेहतर संपर्क, अधिक कैंपस प्लेसमेंट, करियर काउंसलिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सुविधाओं में सुधार की मांग उठाई जा सकती है।
कई छात्र चाहते हैं कि कॉलेजों में केवल डिग्री तक सीमित शिक्षा न हो, बल्कि उन्हें उद्योग की जरूरतों के मुताबिक कौशल विकसित करने के अवसर भी मिलें।
कैंपस में चुनावी अभियान का रंग
DUSU चुनाव की सबसे खास बात इसका कैंपस माहौल होता है। चुनाव की घोषणा के साथ ही विश्वविद्यालय के विभिन्न इलाकों में पोस्टर, पर्चे, बैठकें और छात्र संपर्क अभियान बढ़ जाते हैं।
उम्मीदवार छात्रों से सीधे संपर्क करने के लिए कॉलेज कैंपस, हॉस्टल और छात्र गतिविधियों से जुड़े स्थानों पर पहुंचते हैं। संगठन अपने समर्थकों के साथ बैठकें आयोजित करते हैं और चुनावी रणनीति पर चर्चा करते हैं।
हालांकि, चुनावी अभियान के दौरान विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करना भी महत्वपूर्ण होगा। पोस्टर लगाने, प्रचार करने और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर विश्वविद्यालय की निर्धारित आचार संहिता और नियमों का पालन करना आवश्यक होगा।
सोशल मीडिया बना नया चुनावी मैदान
पिछले कुछ वर्षों में छात्र राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका काफी बढ़ी है। DUSU चुनाव में भी उम्मीदवार और छात्र संगठन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए छात्रों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
वीडियो संदेश, पोस्टर, लाइव बातचीत, घोषणापत्र और कैंपेन अपडेट सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किए जाते हैं। इससे उम्मीदवारों को कम समय में बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंचने का मौका मिलता है।
हालांकि, सोशल मीडिया अभियान के साथ गलत सूचना और भ्रामक दावों की चुनौती भी सामने रहती है। इसलिए छात्रों के लिए यह जरूरी होगा कि वे उम्मीदवारों के दावों और घोषणाओं की पुष्टि करें और आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें।
छात्र संगठनों के बीच बढ़ेगा मुकाबला
DUSU चुनाव में विभिन्न छात्र संगठन अपनी विचारधारा और छात्र मुद्दों के आधार पर समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं। चुनावी मैदान में प्रमुख छात्र संगठनों के अलावा स्वतंत्र उम्मीदवार भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं।
अध्यक्ष पद को सबसे प्रतिष्ठित पदों में माना जाता है। इसके अलावा उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पदों पर भी उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।
कौन सा संगठन किस उम्मीदवार को मैदान में उतारता है, इस पर भी छात्रों की नजर रहेगी। उम्मीदवारों की लोकप्रियता, संगठन की कैंपस में मौजूदगी और स्थानीय छात्र मुद्दों की समझ चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
कॉलेज स्तर पर भी बढ़ेगी गतिविधि
DUSU चुनाव का प्रभाव केवल नॉर्थ कैंपस तक सीमित नहीं रहता। दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े विभिन्न कॉलेजों में भी छात्र राजनीति सक्रिय होती है।
कॉलेजों में छात्रों के बीच संपर्क अभियान, बैठकें और चर्चाएं बढ़ सकती हैं। स्थानीय कॉलेज मुद्दे भी केंद्रीय चुनावी मुद्दों के साथ जुड़ सकते हैं।
कई बार किसी कॉलेज में कैंटीन, लाइब्रेरी, कक्षाओं, खेल सुविधाओं या परिवहन से जुड़ी समस्या केंद्रीय चुनावी अभियान का हिस्सा बन जाती है। ऐसे में उम्मीदवारों को विश्वविद्यालय के साथ-साथ कॉलेज स्तर के मुद्दों पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ सकती है।
चुनावी आचार संहिता पर रहेगी नजर
DUSU चुनाव के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से निर्धारित नियमों और चुनावी आचार संहिता का पालन महत्वपूर्ण होता है। प्रचार के दौरान अनुशासन बनाए रखना और छात्रों के बीच स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना जरूरी है।
कैंपस में किसी भी तरह की हिंसा, धमकी, तोड़फोड़ या जबरन प्रचार की घटनाएं चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे मामलों को रोकने के लिए प्रशासन और छात्र संगठनों दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
छात्र नेताओं से भी अपेक्षा रहती है कि वे चुनाव को लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने में सहयोग करें।
चुनावी खर्च और पारदर्शिता का सवाल
छात्र चुनावों में खर्च का मुद्दा भी अक्सर चर्चा में रहता है। चुनाव प्रचार में होने वाले खर्च, प्रचार सामग्री और अन्य गतिविधियों को लेकर पारदर्शिता की जरूरत होती है।
छात्र संगठनों और उम्मीदवारों को विश्वविद्यालय के निर्धारित नियमों के भीतर रहकर प्रचार करना होगा। चुनाव में धनबल का प्रभाव कम करने और सभी उम्मीदवारों को समान अवसर देने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है।
यदि इस बार 17 सितंबर को मतदान होता है, तो चुनावी प्रक्रिया के हर चरण में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
छात्रों की भागीदारी पर भी निगाह
किसी भी छात्र चुनाव की सफलता केवल उम्मीदवारों या संगठनों से तय नहीं होती। छात्रों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
DUSU चुनाव में बड़ी संख्या में छात्र मतदान करते हैं, लेकिन मतदान प्रतिशत बढ़ाना हमेशा एक चुनौती रहता है। कई छात्र चुनावी राजनीति में रुचि नहीं लेते या विभिन्न कारणों से मतदान नहीं कर पाते।
इस बार छात्र संगठनों की कोशिश हो सकती है कि वे अधिक से अधिक छात्रों को मतदान के लिए प्रेरित करें। वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन भी मतदान प्रक्रिया को सुचारु बनाने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं कर सकता है।
युवा नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण मंच
DUSU चुनाव को केवल विश्वविद्यालय स्तर का चुनाव मानना पूरी तस्वीर नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय लंबे समय से देश की छात्र राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
यहां से निकलने वाले कई छात्र नेता आगे चलकर सार्वजनिक जीवन और राजनीति में सक्रिय हुए हैं। इसलिए DUSU चुनाव युवा नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जाता है।
छात्र चुनावों के जरिए युवाओं को बहस, संगठन, नेतृत्व, सार्वजनिक संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि DUSU चुनाव पर विश्वविद्यालय के बाहर भी राजनीतिक और सामाजिक हलकों की नजर रहती है।
मुद्दों की राजनीति बनाम व्यक्तिगत प्रचार
आने वाले चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि छात्र संगठन किस तरह का अभियान चलाते हैं। क्या चुनाव मुख्य रूप से छात्र समस्याओं और नीतिगत मुद्दों पर केंद्रित रहेगा या फिर व्यक्तिगत लोकप्रियता और राजनीतिक नारों का प्रभाव ज्यादा दिखाई देगा?
छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि उम्मीदवार उनके वास्तविक मुद्दों पर क्या समाधान पेश करते हैं।
केवल चुनाव जीतने के वादे के बजाय छात्रों के सामने स्पष्ट रोडमैप रखना उम्मीदवारों की विश्वसनीयता बढ़ा सकता है। फीस, हॉस्टल, प्लेसमेंट, सुरक्षा और शैक्षणिक सुविधाओं जैसे मुद्दों पर ठोस योजनाएं छात्रों के निर्णय को प्रभावित कर सकती हैं।
प्रशासन की तैयारियां भी होंगी महत्वपूर्ण
यदि 17 सितंबर को मतदान की तारीख तय होती है, तो विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने चुनाव प्रक्रिया को सुचारु तरीके से संचालित करने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
मतदान केंद्रों की व्यवस्था, सुरक्षा, मतदाता सूची, पहचान सत्यापन, मतदान प्रक्रिया और मतगणना से जुड़े इंतजाम समय पर पूरे करने होंगे।
चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों की आवाजाही को देखते हुए प्रशासन को कैंपस में सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने पर भी ध्यान देना होगा।
उम्मीदवारों की घोषणा का इंतजार
फिलहाल छात्रों की नजर संभावित उम्मीदवारों और प्रमुख छात्र संगठनों की घोषणाओं पर है। जैसे-जैसे चुनाव की तारीख स्पष्ट होगी, वैसे-वैसे उम्मीदवारों के नाम और चुनावी रणनीतियां भी सामने आने की उम्मीद है।
अध्यक्ष पद पर कौन आमने-सामने होगा, यह चुनावी मुकाबले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके अलावा अन्य केंद्रीय पदों के उम्मीदवार भी अपनी अलग रणनीति के साथ मैदान में उतरेंगे।
17 सितंबर हुआ तो कब से तेज होगा प्रचार?
यदि मतदान वास्तव में 17 सितंबर को कराया जाता है, तो चुनावी गतिविधियों को आने वाले दिनों में तेजी मिल सकती है। उम्मीदवारों के चयन के बाद प्रचार अभियान अधिक संगठित रूप ले सकता है।
छात्र संगठनों की बैठकें, कॉलेज स्तर पर संपर्क अभियान, सोशल मीडिया कैंपेन और घोषणापत्र जारी करने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आएगी, उम्मीदवारों के बीच बहस और छात्रों को अपने पक्ष में करने की कोशिश भी बढ़ने की संभावना है।
छात्रों के सामने होंगे कई विकल्प
DUSU चुनाव में छात्रों के पास विभिन्न उम्मीदवारों और संगठनों के बीच चुनाव करने का विकल्प होगा। ऐसे में उम्मीदवारों का पिछला रिकॉर्ड, छात्र मुद्दों पर उनका काम, संगठन की नीतियां और चुनावी घोषणाएं महत्वपूर्ण होंगी।
छात्रों के लिए यह जरूरी होगा कि वे केवल प्रचार सामग्री या सोशल मीडिया लोकप्रियता के आधार पर फैसला न करें, बल्कि उम्मीदवारों के एजेंडे और उनकी व्यावहारिक योजनाओं को भी समझें।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जागरूक मतदाता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
चुनावी माहौल में बढ़ सकती है राजनीतिक बयानबाजी
DUSU चुनाव के दौरान छात्र राजनीति में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो सकती है। अलग-अलग छात्र संगठन राष्ट्रीय और विश्वविद्यालय स्तर के मुद्दों को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठा सकते हैं।
हालांकि, स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस और व्यक्तिगत आरोपों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी होगा। चुनावी प्रतिस्पर्धा में विचारों और नीतियों पर बहस छात्रों के लिए अधिक उपयोगी होती है।
छात्र संगठनों के सामने भी चुनौती होगी कि वे अपने अभियान को मुद्दा आधारित और शांतिपूर्ण बनाए रखें।
मतदान के दिन की होगी सबसे बड़ी परीक्षा
17 सितंबर को मतदान होने की स्थिति में चुनावी अभियान का सबसे महत्वपूर्ण दिन मतदान का दिन होगा। उस दिन सुरक्षा, मतदान केंद्रों पर व्यवस्था और छात्रों की भागीदारी पर सबसे अधिक ध्यान रहेगा।
उम्मीदवारों के समर्थक छात्रों को मतदान के लिए प्रेरित कर सकते हैं, लेकिन चुनावी नियमों और निर्धारित प्रतिबंधों का पालन करना अनिवार्य होगा।
मतदान के बाद मतगणना और परिणाम की प्रक्रिया भी छात्रों की उत्सुकता का केंद्र बनेगी।
परिणाम तय करेंगे कैंपस की नई दिशा
DUSU चुनाव के परिणाम केवल चार पदों पर जीत-हार तय नहीं करते, बल्कि आने वाले समय में कैंपस की छात्र राजनीति की दिशा पर भी असर डाल सकते हैं।
जिस संगठन को छात्रों का समर्थन मिलेगा, उसके सामने चुनावी वादों को पूरा करने की चुनौती होगी। जीत के बाद छात्र संगठन को विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने छात्रों की समस्याओं को उठाना और उनके समाधान के लिए काम करना होगा।
यही कारण है कि चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादे परिणाम आने के बाद भी चर्चा में रहते हैं।
लोकतांत्रिक भागीदारी का अवसर
DUSU चुनाव छात्रों को सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अवसर देता है। चुनाव के जरिए छात्र अपनी पसंद के प्रतिनिधियों का चयन करते हैं और विश्वविद्यालय से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करते हैं।
इसलिए चुनावी प्रक्रिया को केवल राजनीतिक मुकाबले के रूप में नहीं, बल्कि छात्र प्रतिनिधित्व के अवसर के रूप में देखना महत्वपूर्ण है।
यदि 17 सितंबर को मतदान की तारीख आधिकारिक रूप से तय होती है, तो आने वाले सप्ताह दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए बेहद राजनीतिक और सक्रिय रहने वाले हैं।
अब आधिकारिक घोषणा का इंतजार
फिलहाल 17 सितंबर को मतदान की संभावित तारीख को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन अंतिम कार्यक्रम की पुष्टि आधिकारिक घोषणा के बाद ही होगी। मतदान की तारीख के साथ नामांकन, उम्मीदवारों की अंतिम सूची, प्रचार की अवधि और मतगणना से जुड़ी जानकारी भी स्पष्ट होगी।
तारीख की आधिकारिक घोषणा होते ही छात्र संगठनों की चुनावी रणनीति पूरी तरह सामने आने लगेगी। इसके साथ ही उम्मीदवारों के नाम, घोषणापत्र और प्रमुख चुनावी मुद्दों पर भी तस्वीर साफ होगी।
कुल मिलाकर, DUSU चुनाव को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय का कैंपस धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगता दिखाई दे रहा है। 17 सितंबर को संभावित मतदान ने छात्र संगठनों की तैयारियों को गति दे दी है। अब सभी की नजर आधिकारिक चुनाव कार्यक्रम और उम्मीदवारों की घोषणा पर है।
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