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ईसीआई शक्तियों पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब
Tara Tandi
5 Oct 2026 2:25 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को एक याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में चुनाव आयोग की शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके को चुनौती दी गई है और यह सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं या उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं जो कई सदस्यों वाली चुनाव संस्था को सौंपी गई हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने तीनों चुनाव आयुक्तों से भी जवाब मांगा। याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील विकास सिंह ने कहा कि ECI की विश्वसनीयता कम हुई है और CEC चुनाव संस्था को चलाने वाले कानूनी ढांचे के खिलाफ काम कर रहे हैं।
विकास सिंह ने कहा कि कुछ अंतरिम उपायों की ज़रूरत है, क्योंकि ECI के मौजूदा कामकाज से नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। सीनियर वकील ने कहा, "आज, CEC खुद एक संवैधानिक अधिकारी के तौर पर ऐसे तरीके से काम कर रहे हैं जो उस कानून के पूरी तरह खिलाफ है जिसके तहत उनकी नियुक्ति हुई है।"
हालांकि, CJI कांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि शीर्ष अदालत को पहले आरोपों पर प्रमाणित जानकारी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर बाद में कोई फैसला गैर-कानूनी पाया जाता है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "पहले उस (आरोपों) पर प्रमाणित जानकारी ले लेते हैं। हम किसी भी फैसले को कभी भी रद्द कर सकते हैं।"
सिंह ने शीर्ष अदालत से यह भी आग्रह किया कि वह निर्देश दे कि अगली सुनवाई की तारीख तक ECI के फैसले केवल सर्वसम्मति से लिए जाएं। हालांकि, CJI कांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि आयुक्तों से सर्वसम्मति से फैसले लेने की उम्मीद की जाती है और अगर सर्वसम्मति न हो, तो मामले का फैसला बहुमत से किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता एक समाचार रिपोर्ट पर भरोसा कर रहा है और वह ECI का जवाब सुनना चाहेगी। शीर्ष अदालत ने कहा, "समाचार रिपोर्ट पूरी तरह या आंशिक रूप से सही हो सकती हैं। हम उनका जवाब जानना चाहेंगे।" कोर्ट ने कहा कि वह संबंधित पक्षों से जवाब मांगेगी और देखेगी कि कानून का पालन किया गया है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर केस की स्थिति के अनुसार, यह मामला 26 अक्टूबर को सुनवाई के लिए अस्थायी रूप से लिस्ट किया गया है। याचिका में ECI (चुनाव आयोग) को चलाने वाले सामूहिक निर्णय लेने के ढांचे को लागू करने और 'को वारंटो' (अधिकार-पृच्छा) रिट जारी करने की मांग की गई है। यह रिट उस अधिकार के संबंध में मांगी गई है जिसके तहत CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) ने कथित तौर पर चुनाव आयोग के नाम पर काम किया है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार "आयोग" को देता है, न कि किसी एक CEC को। इसमें 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 18 का भी हवाला दिया गया है, जो सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था करती है।
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के उस समय के लिखित संचार और फाइल नोटिंग का सहारा लिया गया है। इन आयुक्तों ने कथित तौर पर अक्टूबर 2025 और अगस्त 2026 के बीच उन फैसलों और कदमों पर आपत्ति जताई थी जो उनकी मंजूरी के बिना ECI के नाम पर लिए गए थे।
याचिका में बताई गई आपत्तियां उन संचार और आदेशों से संबंधित हैं जो कथित तौर पर चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना जारी किए गए थे। इनमें बैठकों से पहले एजेंडा और बाद में मिनट्स (कार्यवृत्त) का न होना, बिना मंजूरी के विदेश यात्रा, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच और पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर करना शामिल है।
याचिका में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा "मतदाता सूची डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण" और चुनाव आयोग के IT विभाग के काम के बंटवारे में बदलाव पर जताई गई चिंताओं का भी जिक्र है।
याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की मांग की है कि अनुच्छेद 324 के तहत ECI को मिले अधिकारों का इस्तेमाल या उन्हें चुनाव आयोग के काम के तौर पर तब तक नहीं दिखाया जा सकता, जब तक कि वे आयोग को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अनुसार न हों।
याचिका में सामूहिक निर्णय लेने के ढांचे का पालन सुनिश्चित करने के लिए घोषणात्मक और अनिवार्य निर्देश देने की भी मांग की गई है। साथ ही, विवादित फैसलों से संबंधित प्रासंगिक रिकॉर्ड पेश करने और उन्हें सुरक्षित रखने की भी मांग की गई है।
इस बीच, ECI का कहना है कि आयुक्तों के बीच कथित मतभेद किसी संस्थागत "दरार" का संकेत नहीं हैं और आंतरिक आपत्तियां तथा लिखित नोट बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय में स्थापित प्रक्रियाएं हैं। चुनाव आयोग ने एक बयान में यह भी कहा है कि SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों समेत उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और कमिश्नरों की ओर से उठाए गए मतभेद सामान्य विचार-विमर्श और प्रशासनिक प्रक्रिया का ही हिस्सा हैं।
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