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UCC पर NDA में बढ़ी सियासी दूरी
नई दिल्ली: समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से UCC को लेकर दिए गए बयान के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं। भाजपा जहां समान नागरिक संहिता को लंबे समय से अपने प्रमुख वैचारिक मुद्दों में रखती आई है, वहीं उसके कुछ सहयोगी दल राष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू करने को लेकर सावधानी बरतने की बात कर रहे हैं।
UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में विभिन्न समुदायों के लिए समान कानून की व्यवस्था करना है। फिलहाल इन विषयों पर अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। यही वजह है कि UCC का मुद्दा कानूनी होने के साथ राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी संवेदनशील माना जाता है।
अमित शाह के बयान के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर UCC की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है। हालांकि किसी राजनीतिक घोषणा या बयान को तत्काल केंद्रीय कानून लाने का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। इसके लिए विधायी प्रक्रिया और व्यापक राजनीतिक-सामाजिक विमर्श की जरूरत होगी।
भाजपा के सहयोगी दलों में UCC को लेकर एक जैसी राय नहीं रही है। कुछ सहयोगी इसके सिद्धांत का विरोध नहीं करते लेकिन उनका जोर इस बात पर है कि आदिवासी समुदायों, धार्मिक समूहों और अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं तथा संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखकर ही कोई कदम उठाया जाए। ऐसे में भाजपा के सामने सहयोगी दलों की चिंताओं को दूर करना महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है।
UCC को लेकर आदिवासी समुदायों से जुड़े सवाल खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। कई क्षेत्रों में विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक व्यवस्था से जुड़ी पारंपरिक प्रथाएं प्रचलित हैं। सहयोगी दलों के कुछ नेताओं की चिंता रही है कि समान कानून बनाते समय इन विशिष्ट सामाजिक परंपराओं पर असर नहीं पड़ना चाहिए।
विपक्ष भी UCC को लेकर सरकार से स्पष्ट मसौदा सामने रखने की मांग करता रहा है। विपक्षी दलों का तर्क है कि केवल ‘समान नागरिक संहिता’ की बात करने के बजाय यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रस्तावित कानून में किन विषयों को शामिल किया जाएगा और विभिन्न समुदायों के मौजूदा अधिकारों तथा प्रथाओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
दूसरी ओर भाजपा का तर्क रहा है कि संविधान के नीति निदेशक तत्वों में समान नागरिक संहिता का उल्लेख है और समान नागरिक कानून लैंगिक न्याय तथा समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। उत्तराखंड में UCC लागू होने के बाद इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर लेकर राजनीतिक बहस और तेज हुई है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सहयोगी दलों ने UCC को पूरी तरह खारिज कर दिया है या केंद्र ने इसे लागू करने की अंतिम समयसीमा तय कर दी है। अलग-अलग दलों के रुख में शर्तें और चिंताएं हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर UCC की राह आगे बढ़ती है तो भाजपा को कानूनी प्रक्रिया के साथ अपने सहयोगियों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सहमति बनाने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
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