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रेप केस के आरोपी जज कर रहे POCSO सुनवाई
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ बलात्कार का आपराधिक मामला लंबित होने के बावजूद उनके विशेष पॉक्सो अदालत में न्यायिक जिम्मेदारी संभालने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ बलात्कार का मामला विचाराधीन हो, तो क्या उन्हें बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
यह मामला उत्तर प्रदेश के शामली जिले की कैराना अदालत में तैनात अतिरिक्त जिला न्यायाधीश अशोक भारतेंदु से संबंधित है। उनके खिलाफ दिल्ली में बलात्कार का आपराधिक मामला दर्ज है। इस मामले में दिल्ली पुलिस आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। हालांकि, न्यायिक अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी अदालत में सिद्ध नहीं हुए हैं। मामले की शिकायतकर्ता महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर न्यायिक अधिकारी को पॉक्सो मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी से हटाने की मांग की है। याचिकाकर्ता का कहना है कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराध के आरोप का सामना कर रहे अधिकारी को यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करना उचित नहीं है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने 2 नवंबर को इस याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी से जवाब मांगा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राकेश कुमार सिंह ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ बलात्कार का मामला लंबित है और संबंधित आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ चुकी है। इसके बावजूद वह पॉक्सो अदालत की अध्यक्षता कर रहे हैं। अधिवक्ता ने अदालत से आग्रह किया कि जब तक संबंधित मामले का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक न्यायिक अधिकारी से कम से कम पॉक्सो मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी वापस ले ली जाए।
दरअसल, शिकायतकर्ता महिला ने इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी याचिका दाखिल की थी। इसमें न्यायिक अधिकारी को न्यायिक कार्यों से अलग करने की मांग की गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2026 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में यह जानकारी भी सामने आई है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2024 में संबंधित न्यायिक अधिकारी को दिल्ली में दर्ज प्राथमिकी की जांच में शामिल होने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष न्यायिक अधिकारी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले के साथ-साथ उनके प्रशासनिक दायित्वों और शिकायतकर्ता के अधिकारों से जुड़े सवाल भी उठाए गए हैं। अदालत ने फिलहाल न्यायिक अधिकारी को पद से हटाने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों का जवाब मांगते हुए मामले की अगली सुनवाई 11 दिसंबर 2026 के लिए निर्धारित की है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पॉक्सो अधिनियम के तहत गठित विशेष अदालतें नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई करती हैं। ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। अब सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन का पक्ष सामने आने की उम्मीद है। इसके बाद अदालत तय करेगी कि संबंधित न्यायिक अधिकारी की तैनाती और न्यायिक जिम्मेदारियों के संबंध में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं।
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