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स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में दिल्ली का कमाल या रैंकिंग का अलग पैमाना

Ratna Netam
8 Sept 2026 5:01 PM IST
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में दिल्ली का कमाल या रैंकिंग का अलग पैमाना
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नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली की हवा को लेकर अक्सर सबसे ज्यादा चिंता जताई जाती है। सर्दियों के मौसम में यहां का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) कई बार 400 के पार पहुंच जाता है, जिसे बेहद खराब और गंभीर श्रेणी में माना जाता है। लेकिन अब एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने लोगों को हैरान कर दिया है। केंद्र सरकार के **स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026** में दिल्ली ने श्रीनगर और बेंगलुरु जैसे शहरों से बेहतर रैंक हासिल की है।
कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जिस दिल्ली की हवा प्रदूषण के लिए जानी जाती है, वह साफ हवा की रैंकिंग में आगे कैसे निकल गई? क्या इस सर्वे में सिर्फ हवा की गुणवत्ता मापी गई या फिर कोई और पैमाना भी शामिल था? दरअसल, इस पूरी रैंकिंग का आधार केवल AQI नहीं है।
दिल्ली को मिली 21वीं रैंक, श्रीनगर और बेंगलुरु पीछे
केंद्र के स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों की श्रेणी में दिल्ली ने 21वां स्थान हासिल किया है। दिल्ली को 172 अंक मिले हैं और वह विशाखापट्टनम के साथ संयुक्त रूप से इस स्थान पर रही। वहीं श्रीनगर 162.6 अंक के साथ 26वें और बेंगलुरु 152.6 अंक के साथ 32वें स्थान पर रहा।
इस रैंकिंग में दिल्ली से ऊपर लखनऊ ने पहला स्थान हासिल किया है। लखनऊ को 198 अंक मिले, जबकि इंदौर 197 अंक के साथ दूसरे और जबलपुर 195 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
आखिर AQI खराब होने के बावजूद दिल्ली आगे कैसे?
यही इस रैंकिंग का सबसे बड़ा सवाल है। दरअसल, **स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में केवल शहर की मौजूदा हवा को नहीं देखा जाता।** इसमें यह भी जांचा जाता है कि शहर प्रदूषण कम करने के लिए क्या कदम उठा रहा है और उन योजनाओं को जमीन पर कितना लागू किया जा रहा है।
यानी किसी शहर का AQI खराब होने के बावजूद अगर वहां प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं, तो उसे रैंकिंग में अच्छे अंक मिल सकते हैं। ([India Today][3])
रैंकिंग में किन चीजों का हुआ मूल्यांकन?
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण केंद्र सरकार के **नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP)** के तहत कराया जाता है। इसमें शहरों का मूल्यांकन कई अलग-अलग मानकों पर किया जाता है।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
* सड़कों पर उड़ने वाली धूल को नियंत्रित करने के उपाय
* ठोस कचरा प्रबंधन व्यवस्था
* वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने की योजना
* औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण
* निर्माण कार्यों से निकलने वाले मलबे का प्रबंधन
* लोगों में जागरूकता अभियान
* प्रदूषण नियंत्रण योजनाओं का पालन
इसका मतलब यह है कि सर्वेक्षण यह भी देखता है कि कोई शहर भविष्य में हवा को बेहतर बनाने के लिए कितनी गंभीरता से काम कर रहा है।
दिल्ली की असली तस्वीर क्या है?
रैंकिंग में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद दिल्ली की प्रदूषण समस्या खत्म नहीं हुई है। सर्दियों के दौरान दिल्ली का AQI कई बार 400 से ऊपर चला जाता है और कई मौकों पर 450 के करीब भी पहुंच चुका है। इस स्तर पर हवा स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती है।
दिल्ली में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल, औद्योगिक गतिविधियां, पराली का धुआं और मौसम की स्थिति शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि रैंकिंग और वास्तविक हवा की गुणवत्ता दो अलग-अलग बातें हैं। किसी शहर की रैंकिंग अच्छी होने का मतलब यह नहीं है कि वहां प्रदूषण खत्म हो गया है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वहां प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास बेहतर पाए गए हैं।
श्रीनगर जैसी जगह पीछे क्यों रह गई?
श्रीनगर जैसे शहरों की हवा कई मौसमों में दिल्ली की तुलना में बेहतर रहती है, लेकिन सर्वेक्षण में केवल प्राकृतिक रूप से साफ हवा को आधार नहीं बनाया जाता। वहां प्रदूषण नियंत्रण के लिए किए जा रहे प्रयास, योजनाओं का क्रियान्वयन और प्रशासनिक कदम भी अंक तय करते हैं।
इसी वजह से कम प्रदूषण वाले शहर भी कभी-कभी ऐसी रैंकिंग में पीछे रह सकते हैं।
लोगों के लिए क्या संदेश?
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की यह रिपोर्ट यह बताती है कि प्रदूषण से लड़ाई केवल AQI सुधारने तक सीमित नहीं है। इसके लिए लगातार योजनाएं बनाना, उन्हें लागू करना और लोगों की भागीदारी भी जरूरी है।
दिल्ली का उदाहरण बताता है कि एक तरफ शहर प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ सकता है, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण कम करने के लिए उठाए गए कदमों के कारण रैंकिंग में बेहतर प्रदर्शन भी कर सकता है।
हालांकि असली चुनौती यही है कि दिल्ली की रैंकिंग के साथ-साथ जमीन पर हवा की गुणवत्ता भी बेहतर हो और लोगों को साफ सांस लेने का वास्तविक फायदा मिल सके।
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