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Delhi : खरीफ बुवाई में 23% गिरावट, धान-दाल और तिलहन की खेती प्रभावित

Delhi दिल्ली: देश में खरीफ फसलों की बुवाई इस साल धीमी गति से आगे बढ़ रही है, जिससे कृषि क्षेत्र को लेकर चिंता बढ़ गई है। जून के अंत तक खरीफ फसलों का कुल बुवाई रकबा 182.72 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 236.46 लाख हेक्टेयर था। इस तरह बुवाई में करीब 23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट के पीछे मानसून की देरी से शुरुआत और बुवाई प्रक्रिया में धीमी प्रगति मुख्य कारण माने जा रहे हैं। खरीफ सीजन की बुवाई आमतौर पर जून में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के साथ शुरू होती है, लेकिन इस बार कई क्षेत्रों में बारिश की अनियमितता के कारण कृषि कार्य प्रभावित हुए हैं।
सिर्फ धान ही नहीं, बल्कि दालों, तिलहन, मोटे अनाज और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई में भी पिछले साल की तुलना में गिरावट देखी गई है। यह स्थिति कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर संभावित असर को लेकर चिंता बढ़ा रही है।
नए आंकड़ों के अनुसार, 25 जून तक धान की बुवाई में 25.17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इस वर्ष धान का रकबा घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर रह गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 34.41 लाख हेक्टेयर था। धान खरीफ सीजन की सबसे प्रमुख फसल मानी जाती है, इसलिए इसमें आई गिरावट को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दालों की बुवाई में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। इस वर्ष दालों का रकबा 30.47 प्रतिशत घटकर 14.92 लाख हेक्टेयर रह गया है, जबकि पिछले साल यह 21.46 लाख हेक्टेयर था। इसी तरह तिलहन की बुवाई में सबसे अधिक गिरावट देखी गई है, जो 53.33 प्रतिशत घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गई है, जबकि पिछले वर्ष यह 36.41 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई थी।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती मानसून की अनिश्चितता और कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा न होने के कारण किसानों ने बुवाई में देरी की है। इसके अलावा, मिट्टी की नमी और सिंचाई संसाधनों की उपलब्धता भी बुवाई की गति को प्रभावित करती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खरीफ फसलों की स्थिति अभी शुरुआती चरण में है, और यदि आने वाले हफ्तों में मानसून सक्रिय रहता है तो बुवाई के आंकड़ों में सुधार संभव है। कृषि विभाग स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और राज्यों के साथ समन्वय कर रहा है।
किसान संगठनों का कहना है कि यदि बारिश का वितरण ठीक नहीं रहा तो उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है, जिससे बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल, देश के कई हिस्सों में मानसून की प्रगति पर ही खरीफ फसल उत्पादन की दिशा तय होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह कृषि क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे, क्योंकि इसी दौरान बुवाई की रफ्तार तय करेगी कि इस साल उत्पादन कितना मजबूत रह पाएगा।
कुल मिलाकर, खरीफ फसलों की बुवाई में आई यह गिरावट कृषि क्षेत्र के लिए एक चेतावनी संकेत है, जो मौसम की अनिश्चितता और उसकी सीधी निर्भरता को फिर से उजागर करती है।





