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Delhi सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्ति पर जस्टिस भुइयां का सवाल

Kiran
31 Aug 2026 10:41 AM IST
Delhi सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्ति पर जस्टिस भुइयां का सवाल
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Delhi दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को अफ़सोस जताया कि पिछले 76 सालों में किसी "जाने-माने कानून विशेषज्ञ" (distinguished jurist) को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया गया है। उन्होंने नामी कानूनी जानकारों को जज बनाने का समर्थन करते हुए कहा कि इससे बेंच में विविधता और प्रतिभा आएगी। भारत के संविधान का आर्टिकल 124(3)(c) कहता है, "कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए तब तक योग्य नहीं होगा जब तक वह भारत का नागरिक न हो और राष्ट्रपति की नज़र में एक जाने-माने कानून विशेषज्ञ न हो।"
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के LL.M. प्रोग्राम के 13वें दीक्षांत समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, "संविधान के 76 साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी अब तक सुप्रीम कोर्ट में किसी कानून विशेषज्ञ को नियुक्त नहीं किया गया है। यह अफ़सोस की बात है कि यह प्रावधान हमारे संविधान के उन नियमों में से एक बना हुआ है जिनका कभी इस्तेमाल नहीं किया गया।"
उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 124(3)(c) ऐसी नियुक्ति की इजाज़त देता है, फिर भी पिछले 76 सालों में हाई कोर्ट के जजों या वकालत करने वाले वकीलों के अलावा कोई भी सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुँचा है। जस्टिस भुइयां ने बताया, "अब तक किसी कानूनी शिक्षाविद (legal academic) को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया गया है, जबकि कई ऐसे शानदार दिमाग वाले लोग थे जो बेंच का हिस्सा बनने पर अहम योगदान दे सकते थे।" उन्होंने कहा कि या तो केंद्र और कॉलेजियम को लगा कि भारतीय शिक्षा जगत में जज बनने के लिए ज़रूरी गहराई नहीं है, या फिर उन्होंने "अब तक इस प्रावधान पर गंभीरता से विचार नहीं किया है"।
जस्टिस भुइयां ने कानूनी जानकारों में व्यावहारिक अनुभव की कमी वाली आपत्ति को खारिज करते हुए इसे "बहुत सतही आपत्ति" बताया, क्योंकि अमेरिका, यूके, कनाडा और केन्या में जाने-माने शिक्षाविदों को संवैधानिक अदालतों का जज बनाया गया है। उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के लॉ प्रोफेसर फेलिक्स फ्रैंकफर्टर और डॉक्टर से वकील बने सैमुअल मिलर के उदाहरण दिए, जिन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर नॉमिनेट किया गया था।
उन्होंने कहा, "एक जाने-माने कानून विशेषज्ञ बेंच के लिए बहुत मूल्यवान साबित हो सकते हैं। अपनी विद्वता के ज़रिए, वे शीर्ष स्तर पर फ़ैसला लेने की प्रक्रिया में साफ़ तौर पर योगदान दे सकते हैं।" जस्टिस भुइयां ने कहा, “'जाने-माने कानून विशेषज्ञ' (distinguished jurist) का यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि बेंच में प्रतिभाशाली जज शामिल हो सकें। माना जाता था कि अपनी एकेडमिक जानकारी और समझ की वजह से, ऐसे कानून विशेषज्ञ छोटी-मोटी तकनीकी बातों में नहीं उलझेंगे और पब्लिक लॉ से जुड़े मामलों को बेहतर ढंग से संभाल सकेंगे। ऐसी राय भी रही है कि यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर न्यायिक व्यवस्था में अहम योगदान दे सकते हैं। मेरे पास इससे अलग राय रखने की कोई वजह नहीं है।”
उन्होंने कहा कि भारत में कानून के कई “बेहद प्रतिभाशाली” एकेडमिक्स को वह पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थे, और इसलिए वे देश में कानून के विकास में ज़्यादा सार्थक योगदान नहीं दे पाए। जस्टिस भुइयां ने कहा कि देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना के संरक्षक के तौर पर सुप्रीम कोर्ट “तकनीकी बारीकियों से ऊपर” है, और एकेडमिक्स, बार और बेंच में भारत की असली विविधता झलकनी चाहिए।
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