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Delhi : उमस भरी गर्मी बन रही नई चुनौती, 38 डिग्री भी पड़ रही 44 जैसी भारी

Delhi दिल्ली: देश में जैसे ही गर्मी का प्रकोप बढ़ता है, आम लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा तापमान को लेकर होती है। लोग अक्सर पूछते हैं कि आज पारा 42 डिग्री पहुंचा या 45 डिग्री। लेकिन पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि असली खतरा केवल तापमान के आंकड़ों में नहीं छिपा है, बल्कि हवा में मौजूद नमी यानी उमस में है, जो दिखाई नहीं देती लेकिन शरीर पर सीधा और गंभीर असर डालती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार कई बार 38 डिग्री सेल्सियस की उमस भरी गर्मी, 44 डिग्री की सूखी गर्मी से कहीं अधिक खतरनाक और असहनीय महसूस होती है। इसका कारण यह है कि जब हवा में नमी अधिक होती है तो शरीर से पसीना सही तरीके से नहीं निकल पाता, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। यही स्थिति हीट स्ट्रेस को बढ़ाती है, जो कई मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन पर अध्ययन करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘क्लाइमेट सेंट्रल’ के एक नए विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि दुनिया भर में खतरनाक उमस भरी गर्मी (Humid Heat) तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों में ऐसे दिन बढ़े हैं जब तापमान और नमी का संयोजन मानव शरीर की सहनशीलता की सीमा के करीब पहुंच जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारत के कई हिस्सों में गर्मी के साथ-साथ नमी का स्तर भी बहुत अधिक रहता है, जिससे लोगों को वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस होती है। यही कारण है कि मानसून से पहले और बाद के मौसम में भी लोग भारी उमस से परेशान रहते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, उमस भरी गर्मी का सबसे ज्यादा असर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है। लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियों में रहने से शरीर में पानी की कमी, हीट स्ट्रोक, थकान और सांस लेने में कठिनाई जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सिर्फ मौसम की परेशानी नहीं है, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बनता जा रहा है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पारंपरिक रूप से हम केवल तापमान को गर्मी का पैमाना मानते हैं, जबकि “हीट इंडेक्स” यानी तापमान और नमी का संयुक्त प्रभाव अधिक सटीक तस्वीर देता है। कई बार यह इंडेक्स सामान्य तापमान से 5 से 10 डिग्री अधिक महसूस होने वाली गर्मी को दर्शाता है, जो शरीर पर वास्तविक दबाव को स्पष्ट करता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण यह समस्या और बढ़ती जा रही है। वनों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने वातावरण में नमी और गर्मी के संतुलन को बिगाड़ दिया है। इसके चलते गर्मी के दिनों में उमस का स्तर लगातार बढ़ रहा है और हीटवेव की तीव्रता भी अधिक हो रही है।
भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई राज्यों में भीषण गर्मी और उमस के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ा है। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
वैज्ञानिकों ने लोगों को सलाह दी है कि वे केवल तापमान के आंकड़ों पर निर्भर न रहें, बल्कि मौसम की नमी और हीट इंडेक्स को भी ध्यान में रखें। साथ ही, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, हल्के कपड़े पहनना और दोपहर के समय धूप से बचना जरूरी बताया गया है।
सरकार और मौसम विभाग भी अब हीट अलर्ट सिस्टम को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि लोगों को केवल तापमान ही नहीं बल्कि उमस और वास्तविक गर्मी के खतरे के बारे में भी समय पर जानकारी मिल सके।
इस तरह, बदलते जलवायु पैटर्न में उमस भरी गर्मी एक नई और गंभीर चुनौती के रूप में उभर रही है, जो आने वाले समय में स्वास्थ्य और जीवन दोनों पर बड़ा असर डाल सकती है।





