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दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सार्वजनिक मैदानों पर रामलीला आयोजित करने का मौका किसे मिलेगा, यह तय करने का आधार 'पहले आओ-पहले पाओ' (first come, first served) की नीति नहीं हो सकती। कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे एक पारदर्शी सालाना आवंटन प्रणाली लागू करें ताकि प्रशासनिक जानकारी तक बेहतर पहुंच रखने वाले आवेदकों को अनुचित लाभ न मिल सके।
जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि रामलीला और इसी तरह के सांस्कृतिक या धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सार्वजनिक जगहों के आवंटन की "पहले आओ-पहले पाओ" नीति संवैधानिक रूप से अनुचित है, क्योंकि यह देखने में निष्पक्ष लगने के बावजूद असमान अवसर पैदा कर सकती है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे हर साल पहले निर्धारित कार्यक्रम से कम से कम 90 दिन पहले आवेदन आमंत्रित करने के लिए नोटिस जारी करें। इन नोटिस में उपलब्ध मैदानों, आवेदन की समय-सीमा, पात्रता की शर्तों, मूल्यांकन के मानदंडों और शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया का विवरण होना चाहिए।
जब कई पात्र संगठन एक ही जगह के लिए आवेदन करें, तो अधिकारियों को पहले से तय और सार्वजनिक रूप से घोषित स्कोरिंग मैट्रिक्स या अन्य प्रकाशित मानदंडों का उपयोग करके उनके आवेदनों का तुलनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि "पहले आओ-पहले पाओ" का तरीका असल में उन लोगों को फायदा पहुंचाता है जिन्हें दूसरों से पहले मैदान की उपलब्धता के बारे में पता चल जाता है, न कि सभी पात्र आवेदकों को समान अवसर सुनिश्चित करता है। जस्टिस महाजन ने कहा, "इससे एक संरचनात्मक दुविधा पैदा होती है, यानी प्रशासनिक जानकारी तक विशेष पहुंच रखने वाला व्यक्ति ऐसा लाभ प्राप्त कर सकता है जो दूसरों को उपलब्ध नहीं है।"
यह फैसला "रेज ऑफ न्यू बिगिनिंग फाउंडेशन" द्वारा दायर एक याचिका पर आया, जिसमें दिल्ली के एक मैदान पर रामलीला आयोजित करने के लिए उसके आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी। फाउंडेशन ने 2023 और 2024 में उसी जगह पर कार्यक्रम आयोजित किया था। विवाद तब शुरू हुआ जब दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) ने "पहले आओ-पहले पाओ" नीति के आधार पर मैदान किसी अन्य संगठन को आवंटित कर दिया, जिसने पहले आवेदन किया था। याचिकाकर्ता ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की नीति का हवाला दिया, जिसमें पिछले आयोजकों को प्राथमिकता देने का प्रावधान था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिस्पर्धी आवेदनों का मूल्यांकन करते समय किसी संगठन के पिछले अनुभव और नियमों के पालन के रिकॉर्ड पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, पिछले आयोजक केवल इसलिए उस जगह पर अपना स्वतः अधिकार नहीं जता सकते कि उन्होंने वहां पहले कार्यक्रम आयोजित किया था। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर दी जाने वाली कोई भी प्राथमिकता सीमित होनी चाहिए और यह लगातार दो साल से ज़्यादा नहीं हो सकती, खासकर तब जब दूसरे योग्य आवेदक भी उसी मैदान के लिए मुकाबला कर रहे हों।
कोर्ट ने अधिकारियों को सालाना शेड्यूल इस तरह से बनाने का निर्देश भी दिया ताकि अलॉटमेंट और आम शिकायत-निवारण प्रक्रिया इवेंट्स शुरू होने से काफी पहले पूरी हो जाए, जिससे असफल आवेदकों को अपनी आपत्तियां उठाने का सही मौका मिल सके। मौजूदा अलॉटमेंट के तरीके को खारिज करते हुए, कोर्ट ने 2026 के कार्यक्रमों के लिए पहले से किए गए अलॉटमेंट को रद्द करने या मैदान को याचिकाकर्ता को सौंपने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने तर्क दिया कि कार्यक्रम शुरू होने वाले थे, इसलिए उसने मौजूदा साल की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया।
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