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Delhi इसे "बेहद खराब स्थिति" बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि समाज शारीरिक मेहनत की कद्र करने में नाकाम रहा है। कोर्ट ने गौर किया कि जो मज़दूर दिन भर कमर-तोड़ मेहनत करते हैं, वे देश में "सबसे कम वेतन" पाने वालों और "सबसे कम परवाह" किए जाने वालों में शामिल हैं। जस्टिस विमल कुमार यादव ने वीर पाल की अपील पर सुनवाई करते हुए ये बातें कहीं। वीर पाल को एक मज़दूर पर हमला करने का दोषी ठहराया गया था; उस मज़दूर ने काम के बाद सोने की कोशिश करते समय हो रहे शोर-शराबे पर आपत्ति जताई थी।
कोर्ट ने कहा, "दिन भर की कमर-तोड़ मेहनत के बाद शरीर को फिर से ताज़गी देने के लिए रात में अच्छी और शांत नींद की ज़रूरत होती है।" साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि मज़दूरों को "सबसे कम वेतन मिलता है, उनकी सबसे कम परवाह की जाती है और उनकी सबसे कम चिंता की जाती है।"
कोर्ट ने कहा कि समाज में शारीरिक मेहनत को वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार है। कोर्ट ने पश्चिमी देशों की स्थिति से इसकी तुलना करते हुए कहा कि वहाँ ऐसे काम की उचित कद्र की जाती है और उसका सही मेहनताना दिया जाता है। यह मामला 17 मार्च 2002 का है, जब राजिंदर कुमार चांदनी चौक के लाजपत राय मार्केट में एक दुकान के बरामदे में सो रहे थे या सोने की तैयारी कर रहे थे; वे वहीं काम करते थे। पाल और अन्य लोगों द्वारा किए गए शोर-शराबे से उनकी नींद में खलल पड़ा।
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