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बड़े UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज को लेकर बहस तेज, नीति आयोग के वीसी ने बताया जरूरी कदम

नई दिल्ली : बड़े UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने की चर्चा के बीच देशभर में इस मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई है। जहां कुछ विशेषज्ञ इसे डिजिटल भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इससे आम ग्राहकों और छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ सकता है।
इस बीच नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अशोक कुमार लाहिड़ी का बयान चर्चा में आया है। उन्होंने UPI ट्रांजैक्शन पर प्रस्तावित चार्ज का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार को चलाने के लिए राजस्व की जरूरत होती है और बिना किसी तरह के शुल्क या टैक्स के व्यवस्था को लंबे समय तक संचालित करना मुश्किल है।
UPI चार्ज को लेकर शुरू हुई बहस
देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) डिजिटल भुगतान का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारियों तक बड़ी संख्या में लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
अब बड़े UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने की संभावित व्यवस्था को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ लोगों का मानना है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को संचालित करने, सुरक्षा और तकनीकी ढांचे को मजबूत रखने के लिए शुल्क जरूरी हो सकता है।
वहीं, विरोध करने वालों का कहना है कि UPI की सबसे बड़ी खासियत आसान और कम लागत वाला भुगतान है। शुल्क लागू होने से इसका असर ग्राहकों और व्यापारियों दोनों पर पड़ सकता है।
नीति आयोग के वीसी ने किया समर्थन
नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अशोक कुमार लाहिड़ी ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा कि सरकार बिना टैक्स या राजस्व के नहीं चल सकती।
उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से विभिन्न सेवाओं और व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि मामूली शुल्क लिया जाता है तो इसे लेकर ज्यादा चिंता नहीं होनी चाहिए।
उनके अनुसार, डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बनाए रखने के लिए होने वाले खर्च को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
डिजिटल भुगतान के विस्तार के साथ बढ़ी जरूरत
UPI ने भारत में भुगतान प्रणाली को काफी बदल दिया है। कुछ वर्षों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है और छोटे से छोटे लेनदेन के लिए भी लोग मोबाइल भुगतान को प्राथमिकता देने लगे हैं।
डिजिटल भुगतान के बढ़ते दायरे के साथ इसके संचालन, साइबर सुरक्षा और तकनीकी सुविधाओं को बनाए रखने पर भी खर्च होता है। शुल्क समर्थक पक्ष का तर्क है कि इस खर्च की पूर्ति के लिए कुछ व्यवस्था जरूरी हो सकती है।
विरोध करने वालों की अलग राय
दूसरी ओर, कई व्यापारिक संगठनों और विशेषज्ञों ने शुल्क को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि छोटे कारोबारियों के लिए हर दिन बड़ी संख्या में छोटे भुगतान होते हैं।
यदि डिजिटल भुगतान पर शुल्क लागू होता है तो कारोबार की लागत बढ़ सकती है। कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि इससे नकद भुगतान को बढ़ावा मिल सकता है।
ग्राहकों पर असर को लेकर चर्चा
UPI का इस्तेमाल आम ग्राहकों के बीच काफी बढ़ चुका है। लोग किराना दुकान, रेस्टोरेंट, परिवहन और अन्य सेवाओं के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि शुल्क व्यवस्था लागू होने पर इसका असर ग्राहकों की आदतों पर कितना पड़ेगा। हालांकि, अभी शुल्क की अंतिम व्यवस्था और उसके दायरे को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था पर नजर
भारत सरकार लंबे समय से डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे रही है। UPI को देश की डिजिटल भुगतान क्रांति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
शुल्क को लेकर जारी बहस में एक तरफ डिजिटल सिस्टम की लागत और स्थिरता का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ आम लोगों के लिए भुगतान को आसान और सस्ता बनाए रखने की चिंता भी है।
अंतिम निर्णय पर टिकी नजर
UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क को लेकर अभी अंतिम व्यवस्था और उसके प्रभावों पर चर्चा जारी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि शुल्क किन लेनदेन पर लागू होगा और इसका दायरा कितना होगा।
फिलहाल नीति आयोग के वाइस चेयरमैन के बयान के बाद इस मुद्दे पर बहस और तेज हो गई है। जहां एक पक्ष इसे डिजिटल भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम बता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष आम लोगों और व्यापारियों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर सवाल उठा रहा है।





