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दिल्ली दंगे में गैर-इरादतन हत्या की दोषसिद्धि बरकरार, पांचों की अपील खारिज

nidhi
28 Oct 2026 8:26 AM IST
दिल्ली दंगे में गैर-इरादतन हत्या की दोषसिद्धि बरकरार, पांचों की अपील खारिज
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नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान 22 वर्षीय मोनिश की मौत से जुड़े मामले में पांच दोषियों की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने उनकी दोषसिद्धि और सात साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी। जस्टिस मधु जैन ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। मामला हत्या की श्रेणी में नहीं आने वाले गैर-इरादतन मानव वध और हथियारों के साथ दंगा करने के अपराध से संबंधित है। अपील दाखिल करने वालों में अमन कश्यप, देविंदर कुमार, प्रदीप राय, आशीष और अरुण कुमार शामिल हैं। पांचों ने निचली अदालत की दोषसिद्धि तथा सजा को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन के साक्ष्य उनकी भूमिका को केवल भीड़ में मौजूद रहने तक सीमित नहीं दिखाते। अदालत के अनुसार, वे हथियारबंद भीड़ में आगे थे और अन्य लोगों को पीड़ित पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे।
25 फरवरी 2020 की घटना से जुड़ा मामला
अभियोजन के अनुसार, घटना 25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा के दौरान हुई थी। मोनिश का पीछा कर उस पर हमला किया गया। घायल अवस्था में उसे गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भारी वस्तु के प्रहार से मस्तिष्क में आई चोटों के कारण सदमा लगने को मृत्यु का कारण बताया गया। यह मामला दयालपुर थाने में दर्ज प्राथमिकी से संबंधित है। निचली अदालत ने सुनवाई के बाद 30 नवंबर 2024 को पांचों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 13 जनवरी 2025 को सजा सुनाई गई। दोषियों ने इस फैसले के विरुद्ध अलग-अलग अपील दाखिल कीं। समान घटना और कानूनी प्रश्नों से जुड़ी होने के कारण हाई कोर्ट ने अपीलों पर साथ सुनवाई कर साझा निर्णय दिया।
सात साल का कठोर कारावास और जुर्माना
निचली अदालत ने घातक हथियार के साथ दंगा करने के अपराध में एक वर्ष की साधारण कैद सुनाई थी। हत्या की श्रेणी में नहीं आने वाले गैर-इरादतन मानव वध के अपराध में सात वर्ष का कठोर कारावास और 30 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया था। दोनों मूल सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि के साथ सजा के आदेश को भी कायम रखा है। पांचों की दोषसिद्धि भारतीय दंड संहिता की धारा 148 और धारा 304 भाग एक के साथ धारा 149 से संबंधित है। इस मामले में सजा का आधार केवल घटनास्थल पर मौजूद होना नहीं माना गया। अदालत ने भीड़ के साझा उद्देश्य, दोषियों की भूमिका, उकसाने वाले व्यवहार और हमले की परिस्थितियों को एक साथ परखा। अपीलों के निर्णय में इन्हीं पहलुओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा।
गवाहों की विश्वसनीयता पर बचाव पक्ष ने उठाए सवाल
अपीलकर्ताओं ने प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में कथित असंगतियों और पुलिस गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी का मुद्दा उठाया था। पहचान परेड नहीं कराए जाने तथा जांच में कथित कमियों को भी चुनौती का आधार बनाया गया। बचाव पक्ष ने इन्हीं पहलुओं के आधार पर दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। हाई कोर्ट ने इन आपत्तियों पर विचार करते हुए संबंधित इलाके में तैनात बीट कांस्टेबल की गवाही का उल्लेख किया। कांस्टेबल ने पांचों की पहचान की थी और बताया था कि वह अपने आधिकारिक कार्यों के कारण उन्हें घटना से पहले से जानता था। अदालत ने पहचान के प्रश्न को इसी पृष्ठभूमि में परखा और बचाव पक्ष की दलीलों को दोषसिद्धि पलटने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
पुलिस गवाह होने से बयान खारिज नहीं होगा
अदालत ने कहा कि किसी गवाह की गवाही केवल इसलिए खारिज नहीं की जा सकती कि वह पुलिसकर्मी है। उसके बयान का मूल्यांकन दूसरे साक्ष्यों की तरह विश्वसनीयता और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। इस मामले में पुलिस पिकेट पर गवाहों की मौजूदगी को ड्यूटी रिकॉर्ड का समर्थन प्राप्त था। इसलिए उनकी घटनास्थल पर उपस्थिति का दस्तावेजी आधार भी उपलब्ध था। हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि पीड़ित का पीछा किए जाने, उस पर हमला होने और पुलिसकर्मियों के हस्तक्षेप संबंधी घटनाक्रम पर संबंधित गवाहों के बयान काफी हद तक मेल खाते थे। अदालत ने इन बयानों को अलग-अलग देखने के बजाय पूरे घटनाक्रम के साथ परखा। गवाहों की आधिकारिक हैसियत को अपने आप उनकी गवाही अस्वीकार करने का आधार नहीं माना गया।
साझा उद्देश्य और हमले में भूमिका बनी महत्वपूर्ण
अदालत के अनुसार, गैरकानूनी जमावड़े की सदस्यता और आवश्यक साझा उद्देश्य या जानकारी साबित होने पर घातक चोट पहुंचाने वाले विशेष व्यक्ति की पहचान नहीं होना अपने आप अन्य सदस्यों को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। हालांकि, इस निष्कर्ष के लिए आवश्यक कानूनी तत्व और संबंधित व्यक्ति की भूमिका साबित होना जरूरी है। फैसले में यही कसौटी लागू की गई।
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