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मोहन भागवत के दौरे पर विवाद अमेरिकी संगठन के विरोध से गरमाई राजनीति

Ratna Netam
20 Aug 2026 6:11 PM IST
मोहन भागवत के दौरे पर विवाद अमेरिकी संगठन के विरोध से गरमाई राजनीति
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नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख **मोहन भागवत** की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा को लेकर वहां राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। कुछ अमेरिकी संगठनों और कार्यकर्ताओं ने उनके दौरे का विरोध किया है। इस विरोध को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। जहां विरोध करने वाले संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों से जोड़ रहे हैं, वहीं RSS समर्थक इसे भारत विरोधी अभियान का हिस्सा बता रहे हैं।
मोहन भागवत का अमेरिका दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच भी विचारधाराओं को लेकर बहस जारी है। इस पूरे मामले में कई संगठन, मानवाधिकार समूह और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अमेरिकी संस्थान चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
मोहन भागवत के अमेरिका दौरे का विरोध क्यों?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोहन भागवत के अमेरिका दौरे के खिलाफ कुछ समूहों ने प्रदर्शन और ऑनलाइन अभियान चलाया है। इन संगठनों का आरोप है कि RSS की विचारधारा और उससे जुड़े संगठनों को लेकर भारत में अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक मुद्दों पर सवाल उठते रहे हैं।
विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि वे धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए अभियान चला रहे हैं। दूसरी ओर, RSS समर्थक इसे भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला प्रयास बताते हैं।
कौन-कौन संगठन विरोध में सामने आए?
इस विवाद में अमेरिका स्थित कुछ भारतीय मूल के संगठनों के नाम सामने आए हैं। इनमें **इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC)** और **हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR)** जैसे संगठन शामिल बताए जा रहे हैं। इन संगठनों ने पहले भी भारत से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखी है।
इन समूहों का कहना है कि उनका उद्देश्य भारत के खिलाफ अभियान चलाना नहीं बल्कि मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े मुद्दों को उठाना है।
USCIRF की भूमिका क्या है?
इस विवाद में अमेरिकी संस्था **यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF)** का नाम भी चर्चा में आया है। संस्था ने RSS को लेकर चिंता जताई है और अमेरिकी सरकार से संघ नेताओं के संबंध में कड़े कदम उठाने की मांग की है।
USCIRF दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करने वाली अमेरिकी संस्था है। हालांकि भारत सरकार पहले भी USCIRF की कई रिपोर्टों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खारिज कर चुकी है।
RSS समर्थकों का क्या कहना है?
RSS समर्थकों का कहना है कि संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और उसका काम राष्ट्र निर्माण, सेवा और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा है।
उनका आरोप है कि कुछ विदेशी संगठन भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर देश की छवि खराब करने की कोशिश करते हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत भी पहले कह चुके हैं कि RSS खुले तौर पर काम करता है और उसके बारे में गलत धारणा बनाई जाती है।
अमेरिका में भारतीय समुदाय की भूमिका
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या काफी बड़ी है और वहां भारतीय समुदाय राजनीतिक रूप से भी सक्रिय है। भारतीय प्रवासी समुदाय के अंदर भी अलग-अलग विचारधाराओं के लोग मौजूद हैं।
कुछ लोग भारत सरकार और RSS की नीतियों का समर्थन करते हैं, जबकि कुछ लोग उनकी आलोचना करते हैं। यही वजह है कि भारत से जुड़े मुद्दे अमेरिका में भी चर्चा का विषय बन जाते हैं।
क्या यह पहली बार हुआ है?
मोहन भागवत या RSS को लेकर विदेशों में विरोध पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक मुद्दों को लेकर विदेशी मंचों पर बहस होती रही है।
वहीं, भारत समर्थक समूहों का कहना है कि विदेशी संस्थाओं को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
'एंटी-इंडिया अभियान' का आरोप कितना सही?
RSS समर्थक और कुछ राजनीतिक समूह इस विरोध को "एंटी-इंडिया अभियान" बता रहे हैं। उनका तर्क है कि कुछ संगठन लगातार भारत की नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, विरोध करने वाले संगठन इन आरोपों को खारिज करते हैं और कहते हैं कि उनकी आलोचना भारत के खिलाफ नहीं बल्कि कुछ नीतियों और संगठनों के खिलाफ है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर असर?
भारत और अमेरिका के रिश्ते रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा क्षेत्रों में काफी मजबूत हैं। ऐसे में किसी संगठन या नेता को लेकर होने वाली बहस का सीधा असर दोनों देशों के आधिकारिक संबंधों पर पड़ने की संभावना कम होती है।
लेकिन प्रवासी भारतीय समुदाय और राजनीतिक समूहों के बीच यह मुद्दा चर्चा का विषय बना रहता है।
मोहन भागवत के दौरे पर नजर
अब सभी की नजर मोहन भागवत के अमेरिका दौरे और वहां होने वाले कार्यक्रमों पर है। समर्थक इसे भारतीय संस्कृति और विचारों के संवाद का अवसर बता रहे हैं, जबकि विरोधी समूह अपनी चिंताओं को सामने रख रहे हैं।
यह विवाद एक बार फिर दिखाता है कि भारत से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे अब केवल देश तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वैश्विक मंचों पर भी चर्चा का विषय बन जाते हैं।
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