दिल्ली-एनसीआर

वायु प्रदूषण से बढ़ रही डायबिटीज की चिंता, डॉक्टर की बड़ी चेतावनी

Ratna Netam
5 Nov 2026 3:42 PM IST
वायु प्रदूषण से बढ़ रही डायबिटीज की चिंता, डॉक्टर की बड़ी चेतावनी
x
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण अब केवल सांस और फेफड़ों की बीमारियों तक सीमित नहीं रह गया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा शरीर के मेटाबॉलिज्म, हृदय और रक्त वाहिकाओं के साथ ब्लड शुगर को भी प्रभावित कर सकती है। प्रसिद्ध एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और मैक्स हेल्थकेयर के ग्रुप चेयरमैन डॉ. अंबरीश मिथल ने वायु प्रदूषण को टाइप-2 डायबिटीज का एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जोखिम कारक बताया है। उन्होंने कहा कि भारतीय अध्ययनों में हवा में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म कण पीएम 2.5 (PM2.5) और मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप के बीच संबंध सामने आया है। यह जानकारी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब देश के कई शहर खराब वायु गुणवत्ता की समस्या से जूझ रहे हैं।डॉ. अंबरीश मिथल ने 4 नवंबर को वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों पर चर्चा करते हुए बताया कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने की आशंका बढ़ सकती है। उनके अनुसार, पीएम 2.5 के संपर्क में कुछ सप्ताह रहने से भी रक्त शर्करा के स्तर में बदलाव दिखाई दे सकते हैं। उन्होंने भारतीय शोध का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से मधुमेह का जोखिम लगभग 22 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान सामने आया है। हालांकि, यह आंकड़ा संबंधित अध्ययन की परिस्थितियों और प्रदूषण के स्तर से जुड़ा है। इसे हर व्यक्ति के लिए समान जोखिम नहीं समझना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण में मौजूद पीएम 2.5 कण बेहद छोटे होते हैं। इनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये कण वाहनों के धुएं, औद्योगिक गतिविधियों, ईंधन जलने और अन्य प्रदूषण स्रोतों से वातावरण में पहुंच सकते हैं। छोटे आकार के कारण ये सांस के माध्यम से फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच जाते हैं।प्रदूषित हवा में सल्फेट, नाइट्रेट, कार्बन और भारी धातुओं सहित विभिन्न हानिकारक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं। शरीर में इनके प्रवेश से सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इन बदलावों का संबंध इंसुलिन की कार्यक्षमता में कमी और ग्लूकोज के असंतुलन से हो सकता है।टाइप-2 डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर इंसुलिन का प्रभावी उपयोग नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है।इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ने पर रक्त में शर्करा का स्तर सामान्य से अधिक रहने लगता है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर टाइप-2 मधुमेह विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. मिथल के अनुसार, प्रदूषण के महीन कण शरीर में सूजन बढ़ाने के साथ रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि प्रदूषण अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज की कार्यप्रणाली और इंसुलिन के प्रभाव को बाधित करने वाली प्रक्रियाओं से जुड़ा हो सकता है।इसका प्रभाव केवल मधुमेह तक सीमित नहीं है। प्रदूषण के लंबे संपर्क का संबंध उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों के बढ़ते जोखिम से भी पाया गया है। ऐसे में पहले से डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों के लिए खराब वायु गुणवत्ता एक अतिरिक्त स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।वायु प्रदूषण और टाइप-2 डायबिटीज के संबंध पर दुनियाभर में कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं। वर्ष 2025 में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में पीएम 2.5, पीएम 10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ओजोन जैसे प्रदूषकों के संपर्क तथा टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम के बीच सांख्यिकीय संबंध पाया गया था। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि उम्र, अध्ययन की पद्धति, भौगोलिक क्षेत्र और प्रदूषण की मात्रा जैसे कारक परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह समझना जरूरी है कि वायु प्रदूषण मधुमेह का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता है, लेकिन केवल प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से किसी व्यक्ति को डायबिटीज होना निश्चित नहीं है।
टाइप-2 डायबिटीज के अन्य प्रमुख जोखिम कारकों में पारिवारिक इतिहास, शारीरिक निष्क्रियता, अधिक वजन, पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी, असंतुलित खानपान और बढ़ती उम्र शामिल हैं। इन कारकों के साथ वायु प्रदूषण का प्रभाव जुड़ने पर स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और बढ़ सकता है।भारत में मधुमेह पहले से ही एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में जीवनशैली में बदलाव, कम शारीरिक गतिविधि और प्रदूषित वातावरण के कारण स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बढ़ रही हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज की रोकथाम के लिए केवल खानपान और व्यायाम पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। स्वच्छ हवा और स्वस्थ पर्यावरण भी सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।डॉ. मिथल ने इससे पहले भी वायु प्रदूषण और मधुमेह के संबंध को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई है। मैक्स हेल्थकेयर के एक स्वास्थ्य जागरूकता वीडियो में उन्होंने बताया था कि पीएम 2.5 के संपर्क से कुछ सप्ताह में ही ब्लड शुगर प्रभावित हो सकती है और लंबे समय तक संपर्क मधुमेह के जोखिम में योगदान दे सकता है।
खराब वायु गुणवत्ता वाले दिनों में स्वास्थ्य विशेषज्ञ अनावश्यक बाहरी गतिविधियों को सीमित करने की सलाह देते हैं। विशेष रूप से बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा पहले से हृदय, फेफड़ों या मधुमेह संबंधी समस्याओं वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिएजब प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक हो, तो बाहर भारी व्यायाम करने से बचना उपयोगी हो सकता है। आवश्यकता पड़ने पर अच्छी तरह फिट होने वाला एन95 मास्क सूक्ष्म कणों के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है। घर के अंदर प्रदूषण के स्रोतों को कम रखना और जहां संभव हो उपयुक्त एयर प्यूरीफायर का उपयोग करना भी लाभकारी हो सकता है।मधुमेह से पीड़ित लोगों को अपनी निर्धारित दवाएं नियमित रूप से लेनी चाहिए और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ब्लड शुगर की निगरानी करनी चाहिए। केवल प्रदूषण बढ़ने के कारण दवाओं की मात्रा में स्वयं बदलाव नहीं करना चाहिए।विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों में मोटापा, पारिवारिक इतिहास या अन्य जोखिम कारक मौजूद हैं, उन्हें समय-समय पर ब्लड शुगर और एचबीए1सी की जांच के संबंध में चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।डॉ. अंबरीश मिथल का बयान इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करता है कि वायु प्रदूषण का प्रभाव केवल सांस लेने में परेशानी या आंखों में जलन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध शरीर की चयापचय प्रक्रिया और लंबे समय में विकसित होने वाली बीमारियों से भी हो सकता है।ऐसे में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने की व्यापक कोशिश का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
Next Story