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दिल्ली-एनसीआर
CJI सूर्यकांत ने साइबर अपराधियों के खिलाफ सख्ती की वकालत की
Tara Tandi
18 Jun 2026 4:08 PM IST

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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी के कई मामलों में आरोपी एक व्यक्ति की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें अलग-अलग राज्यों में दर्ज FIR को एक साथ जोड़ने की मांग की गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने साइबर अपराधियों के खिलाफ कड़ी मौखिक टिप्पणी करते हुए उन्हें "परजीवी" (parasites) बताया, जो मासूम निवेशकों को अपना शिकार बनाते हैं।
CJI सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत बिहार के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इसमें दखल देने का कोई आधार नहीं बनता और उसे उचित राहत के लिए संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट में जाने की छूट दी।
सुनवाई के दौरान, CJI की अध्यक्षता वाली बेंच ने साइबर धोखाधड़ी करने वालों की कड़ी आलोचना की और कहा कि वे राज्य की सीमाओं से परे काम करते हैं और पूरे देश में अनजान निवेशकों को निशाना बनाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा, "आप लोग (साइबर अपराधी) परजीवी हैं; आप मासूम निवेशकों से पैसे लेते हैं और उन्हें धोखा देते हैं। साइबर अपराधियों के प्रति हमें बहुत सख्त होना होगा।"
बेंच ने कहा, "आप तमिलनाडु में किसी को धोखा देते हैं, फिर जम्मू-कश्मीर और उसके बाद नॉर्थ-ईस्ट चले जाते हैं।" बेंच ने यह भी कहा कि ऐसे अपराधियों का जेल में रहना समाज के हित में होगा।
याचिकाकर्ता ने बिहार, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु और बाद में कर्नाटक में दर्ज FIR को एक साथ जोड़ने की मांग की थी। उसका तर्क था कि सभी मामले एक ही कथित साइबर धोखाधड़ी के लेन-देन से जुड़े हैं, जो 'M/s अनन्या इंजीनियरिंग एंड ट्रेडिंग लिमिटेड' के नाम से खोले गए ICICI बैंक खाते के ज़रिए किए गए थे। याचिका में दावा किया गया कि वह सिर्फ़ 10वीं पास है और उसे शेयर ट्रेडिंग की कोई जानकारी नहीं है। उसे संजय सिंह ने बैंक खाता खोलने के लिए बहकाया था, जिसने खुद को इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट बताया था।
उसने तर्क दिया कि बाद में उसकी जानकारी के बिना तीसरे पक्ष ने उस खाते का इस्तेमाल किया और न तो उसने खुद उसे चलाया और न ही कथित धोखाधड़ी वाले लेन-देन से उसे कोई फ़ायदा हुआ।
FIR को एक साथ जोड़ने की मांग करते हुए, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों का हवाला दिया जो एक ही लेन-देन से जुड़ी कई FIR से संबंधित थे। उसने तर्क दिया कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग जांच होने से उस पर सख़्त कार्रवाई का खतरा है और उसे बार-बार जांच एजेंसियों के सामने पेश होना पड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया और उसे संबंधित हाई कोर्ट में राहत मांगने की छूट दे दी। आदेश में कहा गया, "रिट याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं बनता है। इसलिए रिट याचिका खारिज की जाती है।" साथ ही यह भी कहा गया कि "याचिकाकर्ता, अगर चाहें, तो ज़रूरी राहत के लिए संबंधित हाई कोर्ट में जा सकते हैं।"
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अनिल नाग, सत्यम शेखर, अभिक चंद्र और अदनान पेश हुए। गौरतलब है कि CJI सूर्यकांत का "पैरासाइट्स" (परजीवी) वाला बयान तब आया, जब कुछ हफ़्ते पहले ही उन्होंने एक अलग मामले में साफ़ किया था कि उन्होंने यह शब्द सिर्फ़ उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया था जो फ़र्ज़ी या जाली डिग्री के सहारे किसी पेशे में आते हैं, न कि देश के युवाओं के लिए। उन्होंने कहा था कि भारतीय युवा "विकसित भारत के स्तंभ" हैं और वे उनका बहुत सम्मान और आदर करते हैं।
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