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चीन की नई रणनीति से बढ़ी हलचल BRICS में भारत की भूमिका पर नजर
Ratna Netam
14 Sept 2026 2:41 PM IST

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नई दिल्ली : आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद वैश्विक राजनीति में एक नई बहस शुरू हो गई है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स देशों के सामने पांच सूत्री पहल रखी है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर डिजिटल इकोनॉमी, व्यापार और निवेश तक सहयोग बढ़ाने की बात है। खासतौर पर चीन की ओर से ब्रिक्स के लिए ओपन-सोर्स AI कम्युनिटी बनाने का प्रस्ताव चर्चा में है। इसे अमेरिकी टेक कंपनियों के दबदबे के विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे अमेरिका का वर्चस्व खत्म हो जाएगा या चीन ब्रिक्स का 'बॉस' बन जाएगा।
चीन का नया प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स अब केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित पुराना समूह नहीं रहा। इसके विस्तार ने ग्लोबल साउथ की आवाज को ज्यादा बड़ा मंच दिया है। नई दिल्ली घोषणा में भी ब्रिक्स देशों ने अधिक प्रतिनिधित्व वाली और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तथा बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया है।
आखिर चीन ने चला क्या दांव?
शी जिनपिंग ने ब्रिक्स सम्मेलन में पांच पहलों का प्रस्ताव रखा। इनमें पहली और सबसे चर्चित पहल 'ओपन सोर्स एंड इन्क्लूसिव AI' है। चीन ने ब्रिक्स AI ओपन-सोर्स कम्युनिटी स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाने, लार्ज लैंग्वेज मॉडल के विकास और इस्तेमाल में सहयोग करने तथा AI प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की पेशकश की है।
दूसरी बड़ी पहल व्यापार और निवेश को आसान बनाने से संबंधित है। चीन ने ब्रिक्स स्पेशल इकोनॉमिक जोन पार्टनरशिप का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत सदस्य देशों के बीच नीतिगत तालमेल और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने की परिकल्पना की गई है।
तीसरी पहल डिजिटल उद्योगों को लेकर है। चीन ब्रिक्स के लिए डिजिटल इकोसिस्टम क्लाउड प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाना चाहता है, जिसमें डिजिटल स्किल ट्रेनिंग, टेक्नोलॉजी एक्सचेंज और औद्योगिक सहयोग शामिल होगा। इसके अलावा शी ने औद्योगिक और सप्लाई चेन को स्थिर रखने तथा ब्रिक्स देशों के बीच ज्यादा एकीकृत बाजार विकसित करने पर भी जोर दिया।
यही वह हिस्सा है जहां भारत के लिए अवसर के साथ चुनौती भी पैदा होती है।
क्या अमेरिकी टेक दबदबे को मिलेगी चुनौती?
दुनिया की AI अर्थव्यवस्था में अमेरिकी कंपनियों की मजबूत स्थिति है। चीन पहले से अपना अलग तकनीकी इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। अब अगर ब्रिक्स देशों के लिए साझा ओपन-सोर्स AI प्लेटफॉर्म विकसित होता है तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अमेरिकी कंपनियों के अलावा एक और विकल्प मिल सकता है।
लेकिन यहां 'अमेरिका की धौंस खत्म' होने जैसी बात को तथ्य के बजाय राजनीतिक या विश्लेषणात्मक हेडलाइन की तरह समझना चाहिए। ब्रिक्स का नया AI प्लेटफॉर्म अभी प्रस्ताव के स्तर पर है। इसे वास्तविक विकल्प बनने के लिए तकनीकी मानकों, डेटा सुरक्षा, निवेश, कंप्यूटिंग क्षमता और सदस्य देशों की सहमति जैसी कई बाधाओं को पार करना होगा।
चीन की रणनीति स्पष्ट रूप से केवल AI तक सीमित नहीं दिखाई देती। वह व्यापार, निवेश, डिजिटल इकोनॉमी और सप्लाई चेन को एक व्यापक ब्रिक्स ढांचे में जोड़ना चाहता है।
क्या चीन बन जाएगा ब्रिक्स का 'बॉस'?
ब्रिक्स की संरचना ऐसी नहीं है कि कोई एक देश औपचारिक रूप से इसका बॉस बन जाए। समूह की नई दिल्ली घोषणा में भी संप्रभु समानता, आपसी सम्मान, सहयोग और सहमति जैसे सिद्धांतों को दोहराया गया है। इसलिए चीन कोई योजना पेश कर सकता है लेकिन उसे पूरे समूह की नीति बनाने के लिए अन्य सदस्यों का समर्थन जरूरी होगा।
यहीं भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत ब्रिक्स को किसी एक शक्ति के नेतृत्व वाले पश्चिम-विरोधी गठबंधन में बदलने के बजाय ग्लोबल साउथ के सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के मंच के रूप में पेश करता रहा है। इसी कारण चीन की हर पहल पर भारत का समर्थन स्वतः तय मान लेना सही नहीं होगा।
भारत के लिए AI प्लान में क्या है फायदा?
भारत के पास तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम और विशाल डेवलपर समुदाय है। ऐसे में ओपन-सोर्स AI पर ब्रिक्स देशों के बीच वास्तविक सहयोग होता है तो भारतीय कंपनियों, शोधकर्ताओं और स्टार्टअप के लिए नए अवसर बन सकते हैं।
साझा रिसर्च, AI मॉडल, ट्रेनिंग और तकनीकी संसाधनों तक पहुंच जैसे क्षेत्रों में फायदा संभव है। भारतीय भाषाओं के लिए AI मॉडल विकसित करने में भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग उपयोगी साबित हो सकता है।
लेकिन सवाल यह होगा कि ऐसे प्लेटफॉर्म का नियंत्रण किसके हाथ में होगा। डेटा कहां रखा जाएगा? साइबर सुरक्षा के नियम कौन तय करेगा? तकनीकी मानक किस देश की कंपनियों के हिसाब से बनेंगे? इन्हीं सवालों के कारण भारत चीन के प्रस्तावों पर सावधानी से आगे बढ़ सकता है।
कुछ भारतीय विश्लेषणों में चीन के एकीकृत ब्रिक्स बाजार के प्रस्ताव को लेकर भी चिंता जताई गई है, क्योंकि ज्यादा बाजार एकीकरण से चीनी कंपनियों और उत्पादों की पहुंच बढ़ सकती है।
डॉलर के मोर्चे पर भारत का अलग रास्ता
ब्रिक्स को लेकर एक दूसरी बड़ी चर्चा अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की है। लेकिन यहां भारत की स्थिति को स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है।
भारत ने साझा ब्रिक्स मुद्रा के विचार को आगे बढ़ाने के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने पर जोर दिया है। भारत केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC को ब्रिक्स देशों के बीच जोड़ने की संभावना भी आगे बढ़ा रहा है ताकि सीमा-पार भुगतान ज्यादा आसान और कम खर्चीला हो सके।
इसलिए इसे सीधे 'डॉलर खत्म करने की योजना' कहना अतिशयोक्ति होगी। फिलहाल ज्यादा सटीक बात यह है कि ब्रिक्स सदस्य वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
मोदी-शी मुलाकात ने बढ़ाई दिलचस्पी
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात भी महत्वपूर्ण रही। दोनों देशों ने संबंधों को स्थिर करने और सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई, लेकिन सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे अभी भी मौजूद हैं।
भारत और चीन दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और ब्रिक्स के प्रमुख सदस्य हैं। इसलिए दोनों के रिश्तों का असर समूह की दिशा पर भी पड़ेगा। चीन अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, ऐसे में शी जिनपिंग द्वारा नई दिल्ली में पेश की गई पहलों को अगले साल और मजबूती से आगे बढ़ाए जाने की संभावना है।
भारत के सामने अवसर भी चुनौती भी
चीन का ब्रिक्स AI प्रस्ताव भारत के लिए सीधे स्वीकार या खारिज करने जितना आसान मामला नहीं है। ओपन-सोर्स AI, डिजिटल सहयोग, सप्लाई चेन और व्यापार में भारत को फायदा हो सकता है। दूसरी ओर भारत अपनी डिजिटल संप्रभुता, डेटा सुरक्षा और घरेलू टेक कंपनियों के हितों से समझौता नहीं करना चाहेगा।
यही वजह है कि आने वाले समय में भारत संभवतः सहयोग और रणनीतिक सावधानी दोनों को साथ लेकर चलेगा।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि ब्रिक्स अब वैश्विक आर्थिक और तकनीकी व्यवस्था में ज्यादा बड़ी भूमिका तलाश रहा है। चीन इस मौके का इस्तेमाल अपने AI और आर्थिक मॉडल को ग्लोबल साउथ में आगे बढ़ाने के लिए करना चाहता है। अमेरिका का प्रभाव इससे तुरंत खत्म नहीं होगा और चीन भी रातोंरात ब्रिक्स का 'बॉस' नहीं बन जाएगा। असली मुकाबला इस बात पर होगा कि भविष्य की AI तकनीक, डिजिटल भुगतान, सप्लाई चेन और वैश्विक आर्थिक नियमों को तय करने में किसकी कितनी हिस्सेदारी होती है।
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