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- एलएसी पर चीन ने घटाई...

नई दिल्ली। भारत और चीन के संबंधों में धीरे-धीरे आ रहे सुधार के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। रक्षा मंत्रालय की वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने उत्तरी सीमाओं पर अपनी सैन्य तैनाती में उल्लेखनीय कमी की है। वर्ष 2020 में शुरू हुए सैन्य गतिरोध के बाद यह पहली बार है जब चीनी सैनिकों की संख्या में इतनी बड़ी कमी दर्ज की गई है।
रक्षा मंत्रालय की 323 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 के दौरान उत्तरी सीमाओं पर पीएलए के करीब 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड आकार के सैन्य दल तैनात रहे। इसके अतिरिक्त इतनी ही संख्या में ब्रिगेड सीमा से दूर उनके निर्धारित और पारंपरिक प्रशिक्षण क्षेत्रों में मौजूद थीं। एक कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड में पैदल सेना, तोपखाना, बख्तरबंद वाहन, वायु रक्षा और अन्य सैन्य सहायता इकाइयां शामिल हो सकती हैं।
सैनिकों की वास्तविक संख्या को लेकर रिपोर्ट में कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया गया है। हालांकि सैन्य संरचना के आधार पर किए गए अनुमान के मुताबिक, पिछले वर्ष एलएसी पर चीन के करीब 40 हजार से 50 हजार सैनिक तैनात हो सकते हैं। इतनी ही संख्या में पीएलए के जवान सीमा से दूर प्रशिक्षण क्षेत्रों में मौजूद रहने का अनुमान है। सैनिकों की ये संख्या आधिकारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि ब्रिगेड के सामान्य आकार के आधार पर लगाया गया अनुमान है।
रक्षा मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2025 के दौरान पीएलए बलों की तैनाती में आई कमी को ‘महत्वपूर्ण’ बताया है। मंत्रालय की आधिकारिक वार्षिक रिपोर्ट इस बदलाव की पुष्टि करती है।
सैन्य गतिरोध के मुकाबले बड़ी कमी
एलएसी पर मौजूदा चीनी तैनाती की तुलना वर्ष 2020 के बाद पैदा हुई तनावपूर्ण स्थिति से की जाए तो यह बड़ी कमी है। पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में जून 2020 में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन ने सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिक, टैंक, तोपखाना, मिसाइल प्रणालियां और अन्य सैन्य उपकरण तैनात कर दिए थे।
दोनों देशों के बीच तनाव इतना बढ़ गया था कि हजारों सैनिकों को भीषण सर्दी के दौरान भी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात रखना पड़ा। सैन्य तैयारियों को बनाए रखने के लिए सड़कों, पुलों, हेलीपैड, गोला-बारूद भंडार और अस्थायी आवास का तेजी से विस्तार किया गया था।
अक्टूबर 2024 में हुए डिसइंगेजमेंट समझौते से पहले अकेले लद्दाख सेक्टर में चीन के 60 हजार से अधिक सैनिक तैनात होने का अनुमान था। इनके साथ भारी हथियार और सैन्य वाहन भी मौजूद थे। ऐसे में वर्ष 2025 के दौरान पूरे उत्तरी सीमा क्षेत्र में 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड की मौजूदगी तनाव कम होने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।
अक्टूबर 2024 के समझौते का असर
भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में करीब साढ़े चार साल तक सैन्य गतिरोध चला। दोनों देशों के सैन्य कमांडरों और राजनयिक अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद अक्टूबर 2024 में देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में सैनिकों को पीछे हटाने तथा गश्त से जुड़ी व्यवस्था पर सहमति बनी थी।
समझौते के बाद दोनों पक्षों ने संवेदनशील क्षेत्रों से अपने सैनिकों और अस्थायी सैन्य ढांचों को हटाने की प्रक्रिया पूरी की। इसके साथ ही एलएसी पर पारंपरिक गश्त की व्यवस्था बहाल करने की दिशा में भी कदम उठाए गए। सैनिकों की तैनाती में दर्ज कमी को उसी समझौते और उसके बाद दोनों देशों के बीच हुए संपर्क का परिणाम माना जा रहा है।
हालांकि डिसइंगेजमेंट और डी-एस्केलेशन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। डिसइंगेजमेंट का अर्थ आमने-सामने मौजूद सैनिकों को टकराव वाले बिंदुओं से पीछे हटाना है, जबकि डी-एस्केलेशन में सीमा के निकट जमा सैनिकों, हथियारों और सैन्य उपकरणों की संख्या को व्यापक रूप से कम किया जाता है। ताजा रिपोर्ट के आंकड़े सीमावर्ती इलाकों में तनाव घटने के संकेत देते हैं, लेकिन इसे सीमा पर अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति की पूर्ण बहाली नहीं माना जा सकता।
सीमा पर भारत की सतर्कता कायम
चीन की सैन्य तैनाती कम होने के बावजूद भारत ने उत्तरी सीमाओं पर अपनी निगरानी और तैयारियों में किसी प्रकार की ढील नहीं दी है। भारतीय सेना सीमा से जुड़े क्षेत्रों में अपनी परिचालन क्षमता, आधारभूत ढांचे और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया की व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रही है।
पिछले कुछ वर्षों में सीमावर्ती सड़कों, सुरंगों, पुलों और हवाई पट्टियों के निर्माण में तेजी लाई गई है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य सैनिकों और आवश्यक सैन्य सामग्री को कम समय में सीमा तक पहुंचाना है। आधुनिक निगरानी उपकरणों, ड्रोन और उपग्रह आधारित प्रणालियों का भी इस्तेमाल बढ़ाया गया है।
चीनी सेना ने भी सीमा के दूसरी ओर बड़े पैमाने पर स्थायी बुनियादी ढांचा तैयार किया है। इसलिए सैनिकों की मौजूदा संख्या कम होने के बावजूद आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त बलों को तेजी से एलएसी के करीब पहुंचाने की उसकी क्षमता बनी हुई है। यही कारण है कि भारतीय सैन्य नेतृत्व हालात में सुधार के साथ निरंतर सतर्कता पर जोर देता रहा है।
रिश्ते सामान्य बनाने की दिशा में कदम
पूर्वी लद्दाख में डिसइंगेजमेंट के बाद भारत और चीन के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है। दोनों पक्ष सीमा पर शांति बनाए रखने और बाकी विवादों को बातचीत के जरिए हल करने की आवश्यकता पर सहमत दिखाई दिए हैं। सैनिकों की संख्या में कमी भरोसा बहाल करने की दिशा में सकारात्मक कदम मानी जा सकती है।
फिर भी दोनों देशों के बीच सीमा का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है। एलएसी को लेकर अलग-अलग धारणाओं के कारण पहले भी गश्ती दल आमने-सामने आते रहे हैं। इसलिए स्थायी शांति के लिए सैनिकों को पीछे हटाने के साथ पुराने सैन्य विश्वास बहाली उपायों को मजबूत करना और विवादित क्षेत्रों पर लगातार बातचीत करना आवश्यक होगा।
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट से यह जरूर स्पष्ट होता है कि वर्ष 2025 में एलएसी पर पीएलए की मौजूदगी लंबे सैन्य गतिरोध के दौर की तुलना में कम हुई है। यह भारत-चीन सीमा पर तनाव घटने का बड़ा संकेत है, लेकिन स्थिति को पूरी तरह सामान्य मानने से पहले जमीनी गतिविधियों, सैन्य बुनियादी ढांचे और सैनिकों की आवाजाही पर लगातार नजर रखना जरूरी रहेगा।





