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बच्चों का भविष्य न करें बर्बाद
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने बाल न्याय प्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कानून के साथ संघर्ष में आए बच्चों को जीवनभर अपराधी की पहचान के साथ नहीं जीना चाहिए। बच्चों की गलतियों को उनकी स्थायी पहचान बनाने के बजाय न्याय व्यवस्था को उनके सुधार, पुनर्वास और समाज में सम्मानजनक वापसी पर ध्यान देना चाहिए।
शनिवार, 10 अक्टूबर को नई दिल्ली में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस वर्षों पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने यह बात कही। कार्यक्रम का आयोजन सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति ने यूनिसेफ के सहयोग से किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानून के साथ संघर्ष में आया बच्चा ऐसी परिस्थिति में होता है, जो उसकी पूरी पहचान नहीं बन सकती। उन्होंने बच्चों की पहचान समाचारों और इंटरनेट पर उजागर होने से रोकने तथा पुराने रिकॉर्ड निर्धारित समय पर नष्ट करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि पुनर्वास केवल किसी संस्थान से बच्चे की रिहाई तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक पुनर्वास तभी पूरा होगा, जब बच्चा बिना सामाजिक भेदभाव के अपने परिवार, विद्यालय और समुदाय में दोबारा शामिल हो सके।
जस्टिस सूर्यकांत ने बाल न्याय प्रणाली में दंड के बजाय सुधार को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्थागत हिरासत में रखना अंतिम विकल्प होना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने बच्चों के लिए विशेष कानूनी सहायता उपलब्ध कराने और किशोर न्याय बोर्डों में आवश्यक सुविधाओं को मजबूत करने की बात कही। कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भी बच्चों के प्रति संवेदनशील न्याय व्यवस्था की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय बोर्डों को सामान्य आपराधिक अदालतों की तरह काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि बच्चों में सुधार और बदलाव की क्षमता होती है।
उन्होंने नवंबर 2025 की एक अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि अक्टूबर 2023 तक 18 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के किशोर न्याय बोर्डों में लगभग 55 प्रतिशत मामले लंबित थे। उस अवधि में 55 हजार से अधिक बच्चे फैसलों का इंतजार कर रहे थे। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि बाल न्याय व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करना है। किसी बच्चे की पिछली गलती उसके शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसरों में स्थायी बाधा नहीं बननी चाहिए। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में न्यायाधीश, सरकारी अधिकारी और बाल अधिकार विशेषज्ञ किशोर न्याय कानून के क्रियान्वयन, बच्चों की सुरक्षा, पुनर्वास और आने वाले वर्षों की प्राथमिकताओं पर चर्चा कर रहे हैं।
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