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GLOF खतरे पर केंद्र अलर्ट हिमालयी राज्यों की समीक्षा

Kavita2
3 Sept 2026 4:38 PM IST
GLOF खतरे पर केंद्र अलर्ट हिमालयी राज्यों की समीक्षा
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नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और बर्फीले हिमस्खलन के बढ़ते खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने तैयारियों की समीक्षा शुरू कर दी है। केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने गुरुवार को हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ बैठक कर आपदा प्रबंधन की स्थिति का जायजा लिया।

बैठक में ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ और बर्फीले इलाकों में होने वाले हिमस्खलन जैसे खतरों से निपटने के लिए राज्यों की तैयारियों पर चर्चा की गई। गृह सचिव ने अधिकारियों से अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने और संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार निगरानी सुनिश्चित करने को कहा।

बैठक के दौरान विशेष रूप से उन ग्लेशियल झीलों की पहचान और निगरानी पर जोर दिया गया, जिनसे भविष्य में खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा बर्फ से ढके क्षेत्रों में हिमस्खलन की आशंका वाले इलाकों की जानकारी जुटाने और वहां सुरक्षा उपाय बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।

गृह सचिव ने अधिकारियों से कहा कि आपदा से पहले चेतावनी जारी करने की व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जाए, ताकि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। उन्होंने संवेदनशील इलाकों में रहने वाली आबादी की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया।

बैठक में जल प्रवाह के रास्तों, संभावित खतरे वाले क्षेत्रों और आपदा की स्थिति में राहत एवं बचाव कार्यों की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि किसी भी आपात स्थिति में राहत एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बना रहे।

हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल झीलों का विस्तार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण GLOF का खतरा बढ़ा है। ग्लेशियल झीलों के टूटने से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है, जिससे निचले इलाकों में भारी नुकसान की आशंका रहती है।

इसी तरह बर्फीले क्षेत्रों में हिमस्खलन भी पर्वतीय इलाकों में रहने वाले लोगों और सुरक्षा बलों के लिए बड़ा खतरा बना रहता है। ऐसे क्षेत्रों में मौसम की सटीक जानकारी और समय पर चेतावनी जीवन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

केंद्र सरकार पिछले कुछ समय से हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने पर काम कर रही है। इसमें आधुनिक निगरानी तकनीक, मौसम आधारित चेतावनी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाने जैसे कदम शामिल हैं।

बैठक में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अपने-अपने क्षेत्रों में मौजूद संवेदनशील स्थानों की जानकारी साझा करने और वहां जरूरी तैयारियां पूरी रखने को कहा गया।

अधिकारियों ने बताया कि अर्ली वार्निंग सिस्टम के बेहतर इस्तेमाल से संभावित आपदाओं के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समय पर अलर्ट मिलने से लोगों को सुरक्षित निकालने और नुकसान कम करने में मदद मिलती है।

हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, बादल फटने और ग्लेशियल झीलों से जुड़ी घटनाओं ने आपदा प्रबंधन की जरूरत को और बढ़ा दिया है। ऐसे में केंद्र सरकार लगातार राज्यों के साथ समन्वय कर तैयारियों की समीक्षा कर रही है।

बैठक में आपदा प्रबंधन एजेंसियों की भूमिका, राहत सामग्री की उपलब्धता और बचाव दलों की तैयारियों पर भी चर्चा हुई। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित अभ्यास और निगरानी जारी रखी जाए।

गृह सचिव ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए केवल प्रतिक्रिया व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पहले से तैयारी और जोखिम को कम करने की रणनीति भी जरूरी है।

हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते पर्यावरणीय बदलावों को देखते हुए आने वाले समय में ऐसी निगरानी और चेतावनी प्रणालियों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।

केंद्र की इस समीक्षा बैठक को हिमालयी राज्यों में आपदा जोखिम कम करने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

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