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Delhi कृषि भवन कॉम्प्लेक्स में मौजूद एक मस्जिद, जो सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी बताई जाती है, का मामला सेंट्रल विस्टा रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के बीच दिल्ली हाई कोर्ट पहुँचा है। इसके देखभाल करने वालों ने या तो इसे सुरक्षित रखने या, अगर ऐसा मुमकिन न हो, तो पास में ही नमाज़ के लिए कोई दूसरी जगह देने की मांग की है। जस्टिस अनीश दयाल ने केंद्र, नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल (NDMC) और दिल्ली वक्फ बोर्ड से 'कदीमी मस्जिद' से जुड़ी याचिका पर जवाब मांगा है। कृषि भवन और शास्त्री भवन के रीडेवलपमेंट से इस मस्जिद पर असर पड़ सकता है।
मस्जिद की देखभाल करने वाली कमिटी की ओर से पेश हुए सीनियर वकील सलमान खुर्शीद ने साफ़ किया कि याचिकाकर्ता सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट या कॉमन सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग के निर्माण को रोकना या उसमें देरी नहीं करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी चिंता उस पूजा स्थल के भविष्य को लेकर है, जिसका इस्तेमाल दशकों से सरकारी कर्मचारी और आस-पास के दफ्तरों में काम करने वाले लोग करते आ रहे हैं।
याचिका में मस्जिद को गिराने या हटाने के खिलाफ सुरक्षा की मांग की गई है, जब तक कि अधिकारी यह तय न कर लें कि क्या इसे इसकी मौजूदा जगह पर बनाए रखा जा सकता है या नहीं। इसके लिए "निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्कसंगत" मूल्यांकन की मांग की गई है। अगर यह पाया जाता है कि इस ढांचे को बनाए रखना रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के साथ सही नहीं है, तो याचिकाकर्ताओं ने पास में ही नमाज़ के लिए एक उचित वैकल्पिक जगह की मांग की है।
खुर्शीद ने कोर्ट को बताया कि यह मस्जिद सरकारी कॉम्प्लेक्स बनने से पहले से मौजूद है और सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की यह बात नोट की कि दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 1970 में इस मस्जिद को वक्फ संपत्ति के तौर पर नोटिफाई किया था और इसकी पुरानी अहमियत को माना था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, 1950 और 1960 के दशक में कृषि भवन, शास्त्री भवन और दूसरे सरकारी दफ्तरों की बिल्डिंग बनने के बाद भी यह मस्जिद मौजूद रही। यह मानते हुए कि मस्जिद के नीचे की ज़मीन सरकार की है, याचिकाकर्ताओं ने नमाज़ की सुविधा जारी रखने की अपनी मांग के समर्थन में संविधान के आर्टिकल 25 के तहत धर्म की आज़ादी के अधिकार का हवाला दिया। केंद्र की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि वह निर्देश लेंगे और जवाब दाखिल करेंगे। कोर्ट ने अधिकारियों को जवाब देने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया और मामले की सुनवाई के लिए 2 नवंबर की तारीख तय की।
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