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नई दिल्ली घोषणापत्र पर ब्रिक्स देशों की मुहर दुनिया को दिया बड़ा संदेश

नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में 12 और 13 सितंबर 2026 को आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले दिन सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ स्वीकार कर लिया। भारत मंडपम में आयोजित सम्मेलन में जारी इस दस्तावेज में आतंकवाद, मध्य-पूर्व संकट, वैश्विक शासन व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और विश्व व्यापार संगठन में सुधार, संरक्षणवादी नीतियों तथा वित्तीय सहयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ब्रिक्स देशों का साझा रुख दर्ज किया गया है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ते संघर्ष, आर्थिक अनिश्चितता और सदस्य देशों की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच घोषणापत्र पर आम सहमति बनना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है। सम्मेलन की थीम “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” रखी गई है। घोषणापत्र में इसी आधार पर विकासशील देशों की चिंताओं को प्रमुखता देने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करने का संकल्प व्यक्त किया गया है।
आतंकवाद के खिलाफ साझा और स्पष्ट रुख
नई दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद के सभी स्वरूपों और अभिव्यक्तियों की कड़ी निंदा की गई है। सदस्य देशों ने कहा कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने वालों, उनका समर्थन करने वालों और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क को जवाबदेह बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मानदंड अपनाने का विरोध करते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की बात कही। आतंकवाद के वित्तपोषण, कट्टरपंथ, विदेशी आतंकवादी लड़ाकों की आवाजाही और आधुनिक तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के अंतर्गत आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक अंतरराष्ट्रीय अभिसमय को जल्द अंतिम रूप देने की आवश्यकता बताई गई।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग
घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र को वैश्विक शांति और सुरक्षा का केंद्रीय मंच बताते हुए उसकी संस्थाओं में व्यापक सुधार का समर्थन किया गया है। ब्रिक्स देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना आज की वैश्विक वास्तविकताओं का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करती। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका सहित विकासशील क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया गया है।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। नई दिल्ली घोषणापत्र में वैश्विक शासन संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, लोकतांत्रिक, प्रभावी और जवाबदेह बनाने का आह्वान भारत की इस मुहिम के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सदस्य देशों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने की आवश्यकता स्वीकार की।
डब्ल्यूटीओ में व्यापक सुधार पर जोर
ब्रिक्स देशों ने नियमों पर आधारित, पारदर्शी, खुली, समावेशी और गैर-भेदभावपूर्ण बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। घोषणापत्र में विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ को वैश्विक व्यापार व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ बताया गया। इसके साथ ही डब्ल्यूटीओ की कार्यप्रणाली में सुधार और विवाद निपटान प्रणाली को पूर्ण रूप से बहाल करने की मांग की गई।
सदस्य देशों ने एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी नीतियां वैश्विक व्यापार को बाधित करती हैं। इससे आपूर्ति शृंखलाएं प्रभावित होती हैं और विकासशील देशों की आर्थिक संभावनाओं को नुकसान पहुंचता है। ब्रिक्स ने व्यापार को राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल किए जाने का विरोध किया।
मध्य-पूर्व संकट पर अधिकतम संयम की अपील
मध्य-पूर्व में जारी हिंसा और अस्थिरता को लेकर घोषणापत्र में गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। ब्रिक्स नेताओं ने सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की। सदस्य देशों ने स्पष्ट किया कि संघर्षों का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय संवाद, परामर्श और कूटनीतिक प्रयासों से निकाला जाना चाहिए।
ब्रिक्स में ईरान के साथ संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की मौजूदगी के कारण मध्य-पूर्व संकट पर साझा भाषा तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा था। इसके बावजूद सर्वसम्मति से घोषणापत्र जारी होना भारतीय कूटनीति की सफलता के रूप में देखा जा रहा है। घोषणापत्र में क्षेत्रीय संप्रभुता, नागरिक सुरक्षा, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है।
संरक्षणवाद और आर्थिक दबाव का विरोध
नई दिल्ली घोषणापत्र में बढ़ते संरक्षणवाद और एकतरफा आर्थिक उपायों को लेकर चिंता दर्ज की गई है। सदस्य देशों ने कहा कि प्रतिबंध, अनुचित व्यापारिक बाधाएं और भेदभावपूर्ण आर्थिक कदम वैश्विक विकास को कमजोर कर सकते हैं। ऐसी नीतियों का सबसे अधिक असर विकासशील एवं कम आय वाले देशों पर पड़ता है।
ब्रिक्स देशों ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित और मजबूत बनाने के साथ वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्बाध प्रवाह का समर्थन किया। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आवश्यक उत्पादों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई गई।
स्थानीय मुद्राओं और वित्तीय सहयोग पर चर्चा
घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों के बीच वित्तीय सहयोग मजबूत करने, स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन की संभावनाओं का अध्ययन करने और सुरक्षित सीमा-पार भुगतान व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया है। सदस्य देशों ने नई विकास बैंक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए बुनियादी ढांचे और टिकाऊ विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण बढ़ाने का समर्थन किया।
हालांकि घोषणापत्र में किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा की तत्काल शुरुआत की घोषणा नहीं की गई है। इसके बजाय भुगतान प्रणालियों के बीच तालमेल, स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण और वित्तीय तकनीक में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक घोषणापत्र में वैश्विक शासन को अधिक समावेशी बनाने और ग्लोबल साउथ की भूमिका बढ़ाने को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है। पहले ही दिन दस्तावेज पर सर्वसम्मति भारत की अध्यक्षता और विभिन्न हितों वाले देशों के बीच सहमति बनाने की उसकी क्षमता को रेखांकित करती है।





